कोच्ची के एक अस्पताल में डॉक्टरों ने दिमागी रूप से मृत पुरुष के हाथ एक महिला के शरीर में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किए हैं. ऐसा करके भारत एशिया का दोहरा हाथ प्रत्यारोपण (Double Hand Transplant) करने वाला पहला देश बन गया है.

चिकित्सा-विज्ञान ने आज इतनी अधिक उन्नति कर ली है कि कुछ भी असंभव नहीं लगता. दुनिया भर में डॉक्टरों ने सफलतापूर्वक ऑपरेशन करके लाखों लोगों के जीवन को संवारा है और अब भारत में भी हर प्रकार का उपचार और ऑपरेशन करवाना संभव हो गया है.

19 वर्षीय श्रेया सिद्दानागौड़ा मनिपाल प्रौद्योगिकी संस्थान” (Manipal Institute Of Technology) में रसायन इंजीनियरिंग (Chemical Engineering) की छात्रा है, और वह पहली ऐसी भारतीय महिला है जिनके शरीर में यह सफल प्रत्यारोपण किया गया है.

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पुणे में रहने वाले सुमा नुगिहल्ली और फ़क़ीरगौड़ा सिद्दानागौड़ा की बेटी श्रेया ने 2016 में एक बस दुर्घटना में अपने दोनों हाथ खो दिए थे. उनके हाथों को तब कोहनियों तक काटना पड़ा था.

श्रेया को अपने जीवन में आशा की एक किरण दिखाई दी जब एर्नाकुलम राजगिरी कॉलेज में अंतिम वर्ष बी.कॉम. में पढ़ने वाले 20 वर्षीय सचिन के दोनों हाथ श्रेया को लगा दिए गए. एक मोटर-साइकिल दुर्घटना में सिर पर घातक चोट लगने की वजह से सचिन को दिमागी रूप से मृत घोषित कर दिया गया था.

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13 घंटों तक चलने वाले यह प्रत्यारोपण 20 सर्जनों और 16 अनेस्थेसिया देने वाले डॉक्टरों की एक टीम द्वारा किया गया था, और इस टीम की अध्यक्षता डॉ. सुभ्रमनिया अय्यर ने की थी जो कोच्ची के “अमृता इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस” में पुनर्निर्माण शल्य-चिकित्सा (Reconstructive Surgery) विभाग के प्रमुख हैं.

डॉक्टरों के मन में पहले इस पुरुष से महिला के शरीर में हाथ प्रत्यारोपण करने वाली सर्जरी के बारे में कुछ अनिश्चितता थी, लेकिन फ़िर श्रेया की हाथों को पाने की तीव्र इच्छा देखकर उन्होंने इस सर्जरी को करने का निर्णय लिया.

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सौभाग्यवश श्रेया के शरीर में इस प्रत्यारोपण के कारण अस्वीकृति के कोई संकेत नहीं मिले है. हालांकि उन्हें आजीवन दवाइयाँ लेते रहना पड़ेगा और अब वह अपनी उँगलियों, कलाइयों और कंधों की हरकतों पर ध्यान दे रही हैं. अगले डेढ वर्षों में उनकी बाहों में 85 प्रतिशत तक हरकत होने लगेगी.

विश्व भर में अब तक इस प्रकार के केवल 9 प्रत्यारोपण ही किये गए हैं. चिकत्सा के क्षेत्र में भारत को इतनी अधिक उन्नति करके अपनी एक अलग पहचान बनाते हुए देखकर बहुत गर्व महसूस होता है. यह देखकर भी बहुत अच्छा लगता है कि बहुत से परिवार सामने आकर ज़रूरतमंद लोगों को अंग-दान करके उन्हें एक सामान्य जीवन जीने में सहायता कर रहे हैं.

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