कुछ अच्छी और कुछ बुरी यादों के साथ साल 2018 हमसे विदा लेने वाला है। चाहे राजनितिक घटनाक्रम हो या वैज्ञानिक घटनाक्रम, हर मामले में यह साल भारत के लिए कई मायनों में अलग रहा। इस साल भारत के वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों ने अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में  में कई महत्वपूर्ण खोज की हैं। तो आइये जानते हैं बेटर इंडिया द्वारा जारी भारतीय वैज्ञानिकों की साल 2018 की अभूतपूर्व उपलब्धियां। 

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Credit : minipcr

1. किसानों को विषैले कीटनाशकों से बचाने वाला जेल 

खेत में रसायनों का छिड़काव करते समय अधिकतर किसान कोई सुरक्षात्मक तरीका नहीं अपनाते हैं। जिस वजह से इन किसानों को जहरीले कीटनाशकों का शिकार होना पड़ता है। लेकिन इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल बायोलॉजी ऐंड रीजनरेटिव मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने त्वचा पर लगाने वाला पॉली ऑक्सीम नामक ऐसा जेल बनाया है जो कीटनाशकों और फफूंदनाशी दवाओं में मौजूद जहरीले रसायनों समेत व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले खतरनाक ऑर्गो फॉस्फोरस यौगिक को निष्क्रिय कर सकता है। इस तरह हानिकारक रसायनों का दुष्प्रभाव मस्तिष्क और फेफड़ों में गहराई तक नहीं पहुंच पाता।

2. दुनिया का सबसे पतला पदार्थ 

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर के शोधकर्ताओं ने नैनो तकनीक की मदद से दुनिया का सबसे पतला पदार्थ बनाया है, जो कागज के एक पन्ने से भी एक लाख गुना पतला है। उन्होंने मैग्नीशियम डाइबोराइड नामक बोरॉन यौगिक द्वारा सिर्फ एक नैनोमीटर यानी मनुष्य के बाल की चौड़ाई से लगभग 80,000 गुना पतला एक द्विआयामी पदार्थ तैयार किया है। इसका उपयोग अगली पीढ़ी की बैटरियों से लेकर पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करने वाली फिल्मों के निर्माण में किया जा सकता है।

3. केले के जीनोम का जीन संशोधन 

राष्ट्रीय कृषि-खाद्य जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, मोहाली के शोधकर्ताओं ने जीन संशोधन की क्रिस्पर/सीएएस9 तकनीक की मदद से केले के जीनोम का संशोधन किया है। भारत में किसी भी फल वाली फसल पर किया गया अपनी तरह का यह पहला शोध है। भारत में  गेहूं, चावल और मक्का के बाद केला चौथी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल मानी जाती है। केले की पोषक गुणवत्ता में सुधार, खेती की दृष्टि से उपयोगी गुणों के समावेश और रोग प्रतिरोधी किस्मों के विकास में जीन संशोधन तकनीक अपनायी जा सकती है।

4. जीका वायरस, डेंगू, जापानी एन्सेफ्लाइटिस और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के इलाज के लिए किये गए शोध 

हरियाणा के मानेसर में स्थित राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र (एनबीआरसी) के वैज्ञानिकों ने शिशुओं में छोटे सिर होने के लिए जिम्मेदार जीका वायरस की कोशिकीय और आणविक प्रक्रियाओं का पता लगाया है। एक अन्य शोध में फरीदाबाद स्थित रीजनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने एक प्रमुख प्रोटीन की पहचान की है, यह खोज डेंगू और जापानी एन्सेफलाइटिस के लिए प्रभावी दवा बनाने में मददगार हो सकती है। साथ ही रोहतक के शोधकर्ताओं ने चिकनगुनिया का पता लगाने के लिए मोलिब्डेनम डाइसल्फाइड नैनोशीट की मदद से एक बायोसेंसर विकसित किया।

5. तपेदिक की शीघ्र पहचान करने वाली परीक्षण विधि

ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, फरीदाबाद और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने फेफड़ों और उनके आसपास की झिल्ली में क्षयरोग संक्रमण(टीबी) के परीक्षण के लिए अत्यधिक संवेदनशील, अधिक प्रभावी और तेज विधियां विकसित की हैं। इन नयी विधियों में बलगम में जीवाणु प्रोटीन का पता लगाने के लिए एपटामर लिंक्ड इमोबिलाइज्ड सॉर्बेंट एसे (एलिसा) और इलेक्ट्रोकेमिकल सेंसर (ईसीएस) का उपयोग होता है।

6. पंजाब के भूजल में आर्सेनिक की खोज 

इससे पहले भूजल में आर्सेनिक के अधिक स्तर के लिए पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, असम, मणिपुर और छत्तीसगढ़ को ही प्रभावित माना जाता रहा है। लेकिन, पंजाब के भूजल में भी आर्सेनिक की भारी मात्रा होने का पता चला है। नई दिल्ली स्थित टेरी स्कूल ऑफ एडवांस स्टडीज के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नये अध्ययन में पंजाब के बाढ़ प्रभावित मैदानी क्षेत्रों के भूमिगत जल में आर्सेनिक का अत्यधिक स्तर पाया गया है। यहां भूजल में आर्सेनिक स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के निर्धारित मापदंड से 20-50 गुना अधिक पाया गया है।

7. अंतरिक्ष मौसम चेतावनी मॉडल ने लघु हिम युग को किया खारिज

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आइजर) कोलकाता के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित एक मॉडल की गणनाओं के आधार पर आगामी सनस्पॉट सौर (कलंक चक्र) के शक्तिशाली होने की अवधारणा को नकार दिया गया है। इस विधि द्वारा अगले सनस्पॉट चक्र की शक्तिशाली चरम सक्रियता में पहुंचने की भविष्यवाणियां एक दशक पहले की जा सकती हैं।

 

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