पिछले लेख में हमने आपको साल 2018 के भारतीय वैज्ञानिकों की अभूतपूर्व सफलताओं के बारे में बताया था। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए कुछ और महत्वपूर्ण खोज के बारे में बात करते हैं जिसकी वजह से इन भारतीय वैज्ञानिकों ने पूरी दुनिया में भारत का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया हैं और देश को शीर्ष देशो की बराबरी पर लाकर खड़ा कर दिया है। तो आइये जानते हैं बेटर इंडिया द्वारा जारी एक रिपोर्ट। 

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Credit : sweetsmoke

 

1. ऑटिज्म की पहचान के लिए नया टूल

चंडीगढ़ के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के वैज्ञानिकों ने ऑटिज्म वाले बच्चों की जांच के लिए एक भारतीय टूल विकसित किया है। जिससे रोग की शीघ्र पहचान और हस्तक्षेप से बच्चों में स्वलीनता विकारों को समझने में सहायता मिल सकती है।

2. अल्जाइमर और हंटिंगटन के इलाज की नई आशा

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने अल्जाइमर रोग के लिए जिम्मेदार उन शुरुआती लक्षणों का पता लगाया है, जिससे यादाश्त कम होने लगती है। इस शोध का उपयोग भविष्य में रोग की प्रारंभिक जांच परीक्षण विधियां विकसित करने के लिए किया जा सकता है।

3. प्लास्टर ऑफ पेरिस से होने वाले प्रदूषण से मुक्ति दिलाने वाली हरित तकनीक

पुणे स्थित राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (सीएसआईआर-एनसीएल) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी पर्यावरण हितैषी तकनीक विकसित की है, जो किफायती तरीके से अस्पतालों से प्लास्टर ऑफ़ पेरिस अपशिष्टों को पुर्नचक्रित करने में मदद करती है। इस तकनीक की सहायता से अपशिष्ट को असंक्रमित करके उससे अमोनियम सल्फेट और कैल्शियम बाइकार्बोनेट जैसे उपयोगी उत्पाद बनाए जा सकते हैं।

4. भारतीय सभ्यता पर रोशनी डालते पाषाण युगीन उपकरण और आनुवांशिक अध्ययन

चेन्नई के पास एक गांव में खोजे गए पाषाण युग के उपकरणों से पता चला है कि लगभग 385,000 साल पहले भारत में मध्य पुरापाषाण सभ्यता मौजूद थी। लगभग उसी काल के दौरान यह सभ्यता अफ्रीका और यूरोप में भी विकसित थी। भारत के मध्य पुरापाषाण सभ्यता के उस दौर में ले जाने वाली यह खोज उस लोकप्रिय सिद्धांत को चुनौती देती है, जिसमें कहा गया है कि आधुनिक मानवों द्वारा लगभग 125,000 साल पहले या बाद में मध्य पुरापाषाण सभ्यता अफ्रीका से भारत आई थी।

5. सिक्किम में स्थापित हुआ भूस्खलन चेतावनी तंत्र

केरल स्थित अमृता विश्वविद्यालय और सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के शोधकर्ताओं ने उत्तर-पूर्वी हिमालय के सिक्किम-दार्जिलिंग बेल्ट में एक अंतिसवेंदी भूस्खलन चेतावनी तंत्र स्थापित किया गया है। इस चेतावनी तंत्र में 200 से अधिक सेंसर लगाए गए हैं, जो वर्षाभूमि की सतह के भीतर छिद्र दबाव और भूकंपीय गतिविधियों समेत विभिन्न भूगर्भीय एवं हाइड्रोलॉजिकल मापदंडों की निगरानी करते हैं। यह तंत्र भूस्खलन के बारे में लगभग 24 घण्टे पहले ही चेतावनी दे देता है। 

6. मौसम की भविष्यवाणी के लिए कम्प्यूटिंग क्षमता में संवर्धन

इस साल भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) ने मौसम के पूर्वानुमान और जलवायु निगरानी के लिए कंप्यूटिंग क्षमता को संवर्धित किया है। इसकी कुल उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग (एचपीसी) शक्ति को 6.8 पेटाफ्लॉप के उच्चतम स्तर पर ले जाया गया है। इसके साथ ही भारत अब मौसम और जलवायु संबंधी उद्देश्यों के लिए समर्पित एचपीसी संसाधन क्षमता में यूनाइटेड किंगडम, जापान और यूएसए के बाद दुनिया में चौथे स्थान पर पहुंच गया है।

7. वैज्ञानिकों ने सिल्क पॉलीमर से विकसित की कृत्रिम कशेरुकीय डिस्क

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने सिल्क-आधारित एक ऐसी कृत्रिम जैव डिस्क बनाई है, जिसका भविष्य में डिस्क रिप्लेसमेंट थेरेपी में उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए एक “डायरेक्शल फ्रीजिंग तकनीक” द्वारा सिल्क-आधारित कृत्रिम जैव डिस्क के निर्माण की प्रक्रिया विकसित की गई है। यह डिस्क आंतरिक रुप से हूबहू मानव डिस्क की तरह लगती है और उसकी तरह ही काम भी करती है। एक जैव अनुरुप डिस्क को बनाने के लिए सिल्क बायो पॉलीमर का उपयोग भविष्य में कृत्रिम डिस्क की लागत को कम कर सकता है।

8. कम आर्सेनिक जमाव वाले ट्रांसजेनिक चावल और जल्दी पुष्पण वाली ट्रांसजेनिक सरसों

चावल में आर्सेनिक जमाव की समस्या को दूर करने के लिए, लखनऊ स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के शोधकर्ताओं ने कवकीय जीन का इस्तेमाल करते हुए आर्सेनिक का कम जमाव करने वाली चावल की ट्रांसजेनिक प्रजाति विकसित की है। उन्होंने मिट्टी में पाए जाने वाले एक कवक से आर्सेनिक मिथाइलट्रांसफेरेज (वार्सएम) जीन का क्लोन बनाकर उसे चावल के जीनोम में डाला। एक अन्य अध्ययन में, टेरी स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज को वैज्ञानिकों ने सरसों की शीघ्र पुष्पन वाली ट्रांसजेनिक किस्म विकसित की है।

 

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