पूर्व भारतीय उड़ीसा राज्य का पुरी क्षेत्र जिसे पुरुषोत्तम पुरी, शंख क्षेत्र, श्री क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्री जगन्नाथ जी की मुख्य लीला-भूमि है। उत्कल प्रदेश के प्रधान देवता ‘श्री जगन्नाथ जी’ ही माने जाते हैं। भगवान श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी में आरम्भ होती है। यह ‘रथयात्रा’ पुरी का प्रधान पर्व भी है। इसमें भाग लेने के लिए और इसके दर्शन का लाभ लेने के लिए हज़ारों, लाखों की संख्या में बाल, वृद्ध, युवा, नारी देश के सुदूर प्रांतों से आते हैं।

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इस वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया यानी जुलाई 14, 2018 को शनिवार के दिन रथ यात्रा शुरू हो रही है जिसमें जगन्नाथ का लगभग 45 फीट ऊंचा रथ होता है। यह त्योहार पूरे 9 दिन तक जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इन दिनों भगवान जगन्नाथ का गुणगान किया जाता है।

मान्यता है कि इस जगह आदि शंकराचार्य जी ने गोवर्धन पीठ स्थापित किया था। प्राचीन काल से ही पुरी संतों और महात्मा के कारण अपना घर्मिक, आध्यात्मिक महत्व रखता है। अनेक संत-महात्माओं के मठ यहां देखे जा सकते हैं । कहा जाता है कि त्रेता युग में रामेश्वर धाम पावनकारी रहें, द्वापर युग में द्वारिका और कलियुग में जगन्नाथपुरी धाम ही कल्याणकारी है।

सम्पूर्ण भारत में वर्षभर होने वाले प्रमुख पर्वों होली, दीपावली, दशहरा, रक्षा बंधन, ईद, क्रिसमस, वैशाखी की ही तरह पुरी की रथयात्रा का पर्व भी महत्त्वपूर्ण है। पुरी का प्रधान पर्व होते हुए भी यह रथयात्रा पर्व पूरे भारतवर्ष में लगभग सभी नगरों में श्रद्धा और प्रेम के साथ मनाया जाता है। जो लोग पुरी की रथयात्रा में नहीं सम्मिलित हो पाते वे अपने नगर की रथयात्रा में अवश्य शामिल होते हैं।

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जिस श्रद्धा और भक्ति से पुरी के मन्दिर में सभी लोग बैठकर एक साथ श्री जगन्नाथ जी का महाप्रसाद प्राप्त करते हैं, उससे वसुधैव कुटुंबकम का महत्व स्वत: परिलक्षित होता है। उत्साहपूर्वक श्री जगन्नाथ जी का रथ खींचकर लोग अपने आपको धन्य समझते हैं। श्री जगन्नाथपुरी की यह रथयात्रा सांस्कृतिक एकता तथा सहज सौहार्द्र की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखी जाती है।

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