बलराज साहनी एक ऐसा नाम है जिनकी जिन्दगी सादगी और सहजता के दायरे में ही रही। सिनेमा जगत का एक ऐसा नाम जो स्टाईल, स्टारडम से हमेशा दूर रहा। बलराज साहनी को पहचानने और जानने के लिए केवल उनका संवेदनशील अभिनय ही काफी है। मई 1, 1913 को पाकिस्तान के रावलपिंडी में एक आर्यसमाजी परिवार में जन्मे बलराज साहनी का नाम पहले युधिष्ठिर रखा गया था लेकिन उनकी बुआ ठीक से इस नाम का उच्चारण नहीं कर पाती थीं इसलिए उनका नाम बदलकर बलराज रख दिया गया। वे मशहूर लेखक भीष्म साहनी के बड़े भाई व चरित्र अभिनेता परीक्षित साहनी के पिता हैं। आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर हम उनके जीवन को थोड़ा करीब से जानने की कोशिश करते हैं।

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अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की पढ़ाई और हिंदी साहित्य में मास्टर्स यानी अच्छे पढ़े-लिखे होने के बावजूद बलराज साहनी ने हमेशा अभिनय का ही सपना देखा और अपने बचपन के इस शौक को अपने अंदर हमेशा ज़िंदा रखा। यह उनका शौक ही था जो फिल्मों में अपने किरदार को जीने से पहले वे उनकी जिन्दगी को जीते थे। दो बीघा ज़मीन में कोलकाता की सड़कों पर साहनी ने रिक्शा चलाकर रिक्शेवालों की जिन्दगी को बड़े करीब से जानना चाहा था ताकि वे अपने किरदार के साथ इंसाफ कर सकें। फिल्म काबुलीवाला के किरदार के लिए साहनी ने एक काबुलीवाले के घर एक महीना बिताया था। दोनों ही किरदारों को फिल्मी पर्दे पर उतारने से पहले साहनी ने हकीकत में उनके बीच जाकर उन्हें जिया और यही वजह है कि इन किरदारों को जीवंत करने के लिए साहनी का कोई विकल्प आज भी नहीं है।

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ऐसी कई फिल्में हैं जिसमें उनके किरदारों या फिर किसी गाने को याद करें तो बलराज साहनी एकदम से हमारे ज़हन में आ जाते हैं। फिल्म वक्त में साहनी के निभाए लाला केदारनाथ का किरदार और उन पर फिल्माए गीत “ऐ  मेरी जोहरा ज़बीं, तूझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हसीं और मैं जवां” को लोग आज भी याद करते हैं। बलराज साहनी की तुलना हॉलीवुड और ब्रिटिश व्यवसायिक सिनेमा के चार्ली चेपलिन, वेनेसा रोडग्रेव और राबर्ट रेडफोर्ड जैसे अभिनेताओं से की जा सकती है। बलराज साहनी ने हिंदी सिनेमा को यथार्थवादी अभिनय का तोहफा दिया है।

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बलराज साहनी इंडियन प्रोग्रेसिव थियेटर ऐशोसियेशन (इप्टा) के सदस्य रहे और यही वजह थी कि वो वामपंथी विचारधारा के काफी करीब थे। कहा जाता है कि बलराज साहनी जितने अच्छे अभिनेता थे उतने ही अच्छे इंसान भी। उनके बारे में यह बात मशहूर है कि एक बड़ा नाम होने के बादजूद भी फिल्म की शूटिंग के बाद वे छोटे कर्मचारियों के साथ ही खाना खाया करते थे और उनसे मजाक भी किया करते थे।

बलराज साहनी की जिन्दगी में दुखों ने कईं करवटें ली। पहली करवट में उनकी पत्नी से उनका साथ जिन्दगीभर के लिए उस समय छूट गया जब उन्हे उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। अपने वामपंथी विचारों के चलते वे कईं बार जेल गए जिसका असर उनकी फिल्मों पर भी पड़ा। जिन्दगी में दुखों की एक करवट उस समय उन पर भारी पड़ी जब उनकी बेटी शबनम का अकाल देहांत हो गया। इसके बाद तो बलराज साहनी पूरी तरह टूट गए थे और ऐसी हिम्मत नहीं कर पाए कि वे दोबारा जिन्दगी से लड़ पाते। फिल्म गरम हवा उनकी आखिरी फिल्म रही।

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दुख और संघर्ष के किरदार निभाते- निभाते अप्रैल 13, 1973 को जब चारों ओर बैसाखी की धूम थी, बलराज साहनी ने दुनिया को अलविदा कह दिया। बलराज साहनी जब तक सांस लेते रहे, काम करते रहे। यह एक अच्छा संयोग था कि उनकी अंतिम फ़िल्म गरम हवा थी जिसमें सलीम मिर्ज़ा का निभाया हुआ उनका अंतिम किरदार रहा। शायद यह किरदार उनके सबसे ज़्यादा करीब रहा होगा जिसमें उनकी जिन्दगी की झलक, बंटवारे का दर्द, संघर्ष में गुज़रा जीवन और हर कदम पर एक लड़ाई शामिल थी।

आइए हम आपको “वक़्त” फिल्म का वो गीत दिखाते हैं जो उन्हें याद करते हुए आज भी सबकी जुबां पर आ जाता है:

 

 

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