जब सुख-सुविधाओं से संपन्न युवा अपने कीमती समय को आत्मसंतुष्टि में बिता रहे होते हैं तब कुछ वंचित छात्रों का समूह, अपने दृढ़ संकल्पों के साथ सभी प्रकार की रुढ़ियों को तोड़ते हुए करियर की बुलंदियों को हासिल कर रहे होते हैं। ऐसे जीवंत उदाहरणों में से एक उदाहरण हैं श्वेता अग्रवाल का जिन्होंने रूढ़िवादी सोच को दरकिनार करते हुए सफलता अर्जित की। 

How a Bengal Grocer
Credit : TheBetterIndia

श्वेता का जन्म 1980 में पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के भद्रेश्वर गाँव के एक मारवाड़ी परिवार में हुआ। जब श्वेता का जन्म हुआ तो उनके माता-पिता को छोड़कर परिवार के अधिकांश लोग खुश नहीं थे क्योंकि वे एक लड़के की कामना कर रहे थे। 

उनके परिवार की सोच थी कि केवल लड़के ही माता-पिता की विरासत को आगे ले जा सकते हैं। अगर कोई लड़का जन्म लेता है तो वह अपने पिता के व्यापार को आगे बढ़ाएगा। लेकिन लड़की चौका-बर्तन के सिवाय कुछ नहीं कर सकती। श्वेता के दादा-दादी ने उनके माता-पिता को हिदायत दी थी कि  या तो वे लड़के को जन्म दें या फिर गोद ले लें। 

लेकिन श्वेता के बाद उनके माता-पिता ने किसी भी प्रकार से गोद लेने पर विचार नहीं किया और जिद्द पर अड़ गए। इसका नतीजा यह हुआ कि श्वेता की माँ के साथ परिवार के अन्य सदस्य रूखा व्यवहार करने लगे। हालाँकि संयुक्त परिवार के 15 बच्चों में श्वेता स्नातक करने वाली पहली लड़की थी। 

श्वेता के माता-पिता को अंग्रेजी नहीं आती थी फिर भी उन्होंने श्वेता को इंग्लिश स्कूल में पढ़ाया। उन दिनों उनके कान्वेंट का खर्चा प्रति माह 165 रुपये हुआ करता था और श्वेता के पिता किराने की दुकान में काम करते थे। उन्होंने श्वेता को पढ़ाने और आगे बढ़ाने के लिए कड़ा संघर्ष किया। 

Credit : TheBetterIndia

श्वेता के पिता अपनी पत्नी को हमेशा कहते थे अगर हम रोज के 10 रुपये बचाएंगे तो श्वेता की शिक्षा के लिए ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ेगा। बचपन में जब श्वेता को रिश्तेदार उपहार स्वरूप कुछ पैसे देते तो वे उसे खर्च करने की बजाए अपनी माँ को दे देती थीं। 

जब तक श्वेता ने 10वीं कक्षा पास की तब तक उनके पिता की आर्थिक स्थिति में थोड़ा सुधार आ गया था। लेकिन परिवार अब भी श्वेता की पढ़ाई के खिलाफ था। कॉलेज जाने के दौरान श्वेता के चाचा ने कहा था कि, “पढ़ाई लड़कियों के काम की चीज नहीं है।” इस बारे में श्वेता ने अपने पिता को बताया तो उन्होंने ठान लिया कि इस सयुंक्त परिवार में उनकी बेटी श्वेता ही पहली स्नातक महिला बनेगी। 

जब वे कक्षा 12वीं में थीं तब किसी कारणवश उन्हें सरकारी कार्यालय जाना पड़ा तब उन्हें अहसास हुआ कि फाइल एक टेबल से दूसरे टेबल कितनी धीमी गति से जाती है जो आम आदमी को परेशानी में डाल देती है। 40 मिनट के इंतज़ार के बाद जब श्वेता का काम नहीं हुआ तो उन्होंने बड़े अधिकारी के पास जाकर कहा, “एक दिन मैं डीएम बनकर दिखाऊँगी। 

इसके बाद श्वेता ने सेंट जेवियर्स कॉलेज कोलकाता से अर्थशास्त्र में स्नातक किया। और एमबीए करने के बाद उन्होंने डेलॉइट इंडिया में नौकरी कर ली। लेकिन श्वेता को बचपन से खाकी से बेहद लगाव था। श्वेता के घर से पुलिस स्टेशन महज आधा किलोमीटर दूर था। वे हमेशा उन पुलिस वालों को देखतीं और वहीं से उनके मन में आईपीएस बनने का ख्वाब पनपने लगा।

अपने आईपीएस बनने के ख्वाब के चलते श्वेता ने 13 महीनो बाद अपनी नौकरी छोड़ दी। उनके बॉस ने उन्हें, “कहा कि आप परीक्षा के लिए काम छोड़ने का जोखिम क्यों उठा रही हो। और वह भी ऐसी परीक्षा के लिए जहाँ पांच लाख विद्यार्थियों में से सिर्फ 90 ही पास होते हैं। श्वेता का अपने बॉस को  जवाब था,”मैं उन 90 में से एक हूँ।” 

इसके बाद उन्होंने कोचिंग क्लास शुरू की और सफल उम्मीदवारों के मार्गदर्शन के साथ खुद पढ़ाई शुरू कर दी। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ श्वेता के माता- पिता उनपर शादी करने का दबाव बना रहे थे। ऐसी स्थिति में श्वेता मानसिक तनाव में आ गयीं और उन्होंने परीक्षा नहीं देने का फैसला किया लेकिन उनके माता-पिता ने उन्हें प्रोत्सहित किया और परीक्षा देने के लिए मनाया। 

Credit : TheBetterIndia

वे पहले प्रयास में सफल नहीं हुईं लेकिन वे समझ गयीं कि कड़ी मेहनत से इस परीक्षा में सफल हुआ जा सकता है। इसके लिए श्वेता ने कोलकाता में अलग से एक घर किराये पर लिया और वहाँ पढ़ाई करने लगीं। 2013 के दौरान इस परीक्षा का पूरा पाठ्यक्रम बदल गया जिस वजह से वे काफी मायूस हो गयीं । लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं हारी। 

इसके बाद वे भारतीय राजस्व सेवा की परीक्षा में सफल हुईं लेकिन वे सिर्फ आयपीएस ही बनाना चाहती थीं। इसलिए श्वेता ने दूसरी बार परीक्षा देने का निर्णय लिया और इस बार वे सफल हो गयीं लेकिन 10 अंको से से वे आयपीएस बनने से चूक गयीं। श्वेता ने हिम्मत नहीं हारी वे हर हाल में अपने सपने को पूरा  करना चाहतीं थीं। 

इसलिए उन्होंने तीसरा प्रयास किया ओर 10 मई 2016 को आख़िरकार वह दिन आ ही गया जब श्वेता इस परीक्षा में कामयाब हो गयीं। संघर्ष के पांच साल के बाद श्वेता ने अपने सपने को हासिल किया था। वे पूरे राज्य में प्रथम आयीं। 

Share

वीडियो

Ad will display in 09 seconds