“अपराधी चाहे जितना भी शातिर हो, अपने पीछे कोई ना कोई सुराग़ ज़रुर छोड़ जाता है”…अापने ये डायलॉग क्राइम सीरियल और फिल्मों में ज़रुर सुना होगा। अपराध की दुनिया की बात होती है तो चंदन और हाथी दांत की तस्करी के लिए कुख्यात अपराधी “वीरप्पन” की चर्चा ज़रुर की जाती है। कहते हैं कि वीरप्पन जितना खुंखार था, उतना ही तेज़ उसका दिमाग़ भी चलता है। शायद यही कारण था कि उसे पकड़ने के लिए तीन राज्यों की पुलिस लगी हुई थी और उसे पकड़ने में पुलिस को तीन दशकों से भी ज्यादा वक्त लगा था।

हालांकि इतना चतुर और चालाक होने के बावजूद भी वह बहुत ही आसानी से पुलिस के जाल में फंस गया और अक्तूबर 18, 2004 को अपने तीन साथियों के साथ मारा गया। कहते हैं कि मौत से पहले वीरप्पन ने अपनी मूछें छोटी कराई थी और उसके एनकाउंटर के पीछे उसकी मोतियाबिंद की बीमारी मुख्य वजह रही।

1. मोतियाबिंद की थी बीमारी!

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जनवरी 18, 1952 को पैदा हुआ वीरप्पन बहुत ही जल्द अपराध की दुनिया में कुख्यात हो गया। वीरप्पन का पूरा नाम “कूज मुनिस्वामी वीरप्पा गौड़न” था और वह चंदन और हाथी दांत की तस्करी के लिए कुख्यात था। खबरों की माने तों वीरप्पन को मोतियाबिंद हो गया था और इलाज के लिए उसे दो साथियों के साथ पपरापत्ति के जंगल से बाहर निकलना पड़ा था।

2. खुफिया सूत्रों से मिली जानकारी!

वीरप्पन
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वीरप्पन को पकड़ने के लिए ऑपरेशन चला रही तमिलनाडु एसटीएफ को वीरप्पन के मोतियाबिंद और उसके जंगल से निकलने की जानकारी खुफिया सूत्रों से लग गई। जिसके बाद एसटीएफ ने उसे पकड़ने के लिए एक प्लान तैयार किया। जिसके तहत एसटीएफ का एक मुखबीर वीरप्पन के गैंग से संपर्क बनाने में कामयाब रहा।

3. प्लान के तहत भेजी गई एंबुलेंस!

The ambulance code named “Cocoon” that was planted as a getaway vehicle for Veerappan, and the one in which he was finally killed
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इसके बाद प्लान के तहत एसटीएफ ने एक एम्बुलेंस जंगल में भेजी। खबरों के अनुसार एसटीएफ टीम से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि पुलिस को धोखा देने के लिए वीरप्पन ने अपनी मूंछे छोटी करा ली थी, और अपने अन्य साथियों के साथ एंबुलेंस में सवार हो गया।

4. आत्मसमर्पण की चेतावनी दी!

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उधर वीरप्पन एंबुलेंस में सवार होकर अस्पताल के लिए आगे बढ़ा, तो इधर एसटीएफ भी पूरी तैयारी के साथ मुस्तैद थी। टीम ने अस्पताल जाने वाले रास्ते पर एक ट्रक खड़ा कर दिया, जिसमें हथियारों से लैस एसटीएफ के 22 जवान मौजूद थे। जैसे ही वीरप्पन को ले जा रही एंबुलेंस नज़दीक आई एसटीएफ की टीम ने उसे रोका और माइक से वीरप्पन को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा।

5. साथियों से पहले हो गया ढ़ेर!

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बताया जाता है कि एसटीएफ की टीम द्वारा दूसीर बार आत्मसमर्पण की चेतावनी दिए जाने के बाद वीरप्पन ने अपने साथियों के साथ मिलकर टीम पर फायरिंग शुरु कर दी। उसके बाद जवानों ने भी इधर से गोलियां बरसानी शुरु कर दी। खबरों की माने तो इस एनकाउंटर के दौरान वीरप्पन के माथे पर गोली लगी और वह अपने साथियों से पहले ही ढ़ेर हो गया। जबकि इसके तीन अन्य साथियों के साथ मुठभेड़ अभी भी जारी थी, अंततः वो तीनों भी एसटीएफ की गोलियों के शिकार बने और मारे गए।

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