भगत सिंह को शहीद हुए कितना भी वक़्त क्यों न गुज़र गया हो लेकिन उनके द्वारा दिया गया नारा “इन्कलाब जिंदाबाद” आज भी दुनिया बदलने की ताकत रखता है. हम वह भगत सिंह के बारे में बात कर रहे हैं जिन्होंने भारत को आज़ादी दिलाने के लिए 23 वर्ष की छोटी सी आयु में अपने जीवन का बलिदान दे दिया. उनकी शहादत के लगभग 90 सालों के बाद भी वह आज भी पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं. आइये उनकी 110वीं सालगिरह पर उनके जीवन की कुछ बातें जाने.

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भगत सिंह का जन्म 1907 में ब्रिटिश पंजाब के लायलपुर जिल्ले के बंगा गाँव में एक जाट सिख परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम किशन सिंह और माँ का नाम विद्यावती था. बचपन से ही भगत सिंह का झुकाव आजादी और उससे जुड़े आंदोलनों की तरफ हो गया था. भगत सिंह के नन्हे हृदय पर जलियांवाला काण्ड का बहुत ही गहरा असर हुआ था. वह मात्र 12 वर्ष के थे जब उन्होंने जलियांवाला बाग़ में हज़ारों लोगों के मृत शरीरों को अपनी आँखों से देखा था. इस घटना से उनका मन बहुत दुखी हुआ था और उन्होंने प्रण कर लिया कि वह देश को आज़ादी दिलवाकर रहेंगे.

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भगत सिंह महात्मा गाँधी का बहुत सम्मान करते थे, लेकिन उन्हें गांधीजी की विचारधारा से हटकर क्रांतिकारी तरीके से देश की आज़ादी के लिए लड़ना ज्यादा भाने लगा. चौराचौरी मे जब पुलिसवालों द्वारा गाँव वालों पर बर्बरता से लाठियां चलने पर उनकी मृत्यु हो गई, तब भगत सिंह के जीवन मे बहुत बड़ा मोड़ आया. यहीं से ही उनकी असली क्रांतिकारी आन्दोलन की शुरुआत हुई. लाला लाजपत राय की साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस कर्मियों द्वारा हुए लाठी चार्ज से मृत्यु हो गई. इससे भगत सिंह का मन रोष से भर गया. उन्होंने लालाजी की मृत्यु का बदला लेने का फैसला कर लिया. उन्होंने राजगुरु और चंद्रशेखर आज़ाद के साथ मिलकर A.S.P. सौन्ड़ेर्स की हत्या कर दी.

1929 में उन्होंने असेंबली में बम फेंककर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपना गुस्सा प्रकट किया. बम फैकने के साथ ही उन्होंने और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने अपने साथ लाए हुए पर्चे हवा में उछाल दिए और “इन्कलाब जिंदाबाद” का नारा लगाया. इसके बाद दोनों को वहीं पर गिरफ्तार कर लिया गया.

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भगत सिंह करीब दो साल तक जेल में रहे. जेल में रहकर भी भगत सिंह का अध्ययन बरक़रार रहा. 23 मार्च, 1931 को उन्हें सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी दे दी गई. भले ही उस दिन भगत सिंह ने शारीरिक रूप से हमें अलविदा कह दिया हो लेकिन उनकी विचारधारा आज भी देश के नवयुवकों के लिए प्रेरणादायक है. भगत सिंह का कहना था, “वे मुझे मार सकते हैं, मेरे विचारों को नहीं. वे मेरे शरीर को खत्म कर सकते हैं, लेकिन वे कभी मेरी आत्मा को नहीं मार सकते.”

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