भारतीय तटों पर विभिन्न स्तरों पर समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार शताब्दी के अंत तक समुद्र का जल स्तर 3.5 इंच से 34 इंच (2.8 फीट) तक बढ़ सकता है। जो पूर्वी भारत के प्रमुख डेल्टाओं और मुंबई सहित पश्चिम समुद्र तट के लिए खतरा पैदा कर सकता है। 

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हैदराबाद स्थित इंडियन नेशनल सेण्टर फॉर इनफार्मेशन सर्विसेज द्वारा किये गये अध्ययन को साझा करते हुए सरकार ने शुक्रवार को लोकसभा में बताया कि 1990 और 2100 के बीच समुद्र की वृद्धि की वजह से मुंबई और अन्य पश्चिमी तट गुजरात, खम्बात, कच्छ, कोंकण और दक्षिण केरल जैसे क्षेत्र इसकी चपेट में आ सकते हैं। 

समुद्र स्तर बढ़ने को इसलिए भी बड़ा खतरा बताया जा रहा हैं क्योंकि इसकी वजह से नदी प्रणालियां पूरी तरह से गड़बड़ा सकती हैं। ऐसे में भारत की खाद्य प्रणाली पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ेगा। क्योंकि करोड़ो लोग नदी जल प्रणालियों पर निर्भर हैं। साथ ही जलस्तर बढ़ने से बाढ़ जैसी आपदाओं के कारण लोगों का जीवन खतरे में पड़ सकता है। 

जहाँ एक तरफ सिंचाई के लिए देश में पानी की मांग बढ़ रही है। वहीं इसी साल जारी यूनिस्को की एक रिपोर्ट में यह दावा  किया गया है कि 2050 तक मध्य और दक्षिण भारत को भारी मात्रा में पानी का सामना कन पड़ेगा। यानी बारिश, बाढ़ और सुनामी जैसी आपदाओं की वजह से समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा। 

समुद्र स्तर के बढ़ने से जलवायु परिवर्तन का भारत के तटीय क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में पर्यावरण राज्य मंत्री महेश शर्मा ने कहा, तटीय भूजल में खारे पानी की मात्रा में अनुमानित वृद्धि हुई है। झीलों के लिए खतरा बढ़ा है और बहुमूल्य भूमि पर भी बाढ़ का खतरा बढ़ा है। इसके लिए सरकार देश के तटीय क्षेत्रों और समुदायों की सुरक्षा के लिए सक्रिय कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है। 

वहीं सुरक्षा के लिए उठाये गए कदमों की वजह से तटीय क्षेत्रों पर रहने वालों का जीवन प्रभावित न हो और न ही तटीय पारिस्थिति को कोई नुकसान पहुंचे इसका भी ध्यान रखा जा रहा है। शोधकर्ताओं के मुताबिक दुनिया के कुछ हिस्सों में स्थानीय समुद्री जलस्तर में वृद्धि औसत के मुकाबले लगभग दोगुनी है। 

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