जहां गोलीबारी रोजमर्रा की चीज़ बन गई हो, वहां चैन की नींद भला किसे आ सकती है? असीमित समस्याओं के बावजूद भी ज़िंदगी आगे बढ़ती है और उम्मीद तब भी बरकरार रहती है। यह कहानी है चार पीढ़ियों की, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती गई, जिसकी शुरुआत 1947 में भारत-पाक विभाजन के साथ हुई और जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गोलियों और मोर्रटार के बीच घिरे गांव में आज भी चल रही है।

अब्दुलिया, जम्मू ज़िले के आर,एस पुरा में बसा एक छोटा सा गांव, जो मुश्किल से चहल-पहल वाले जम्मू शहर से 15 किमी की दूरी पर होगा। हालांकि, सीमा के इस तरफ जम्मू है और उस तरफ सियालकोट। इस तरफ यह जम्मू-कश्मीर है, जबकि दूसरी तरफ पंजाब।

बचपन से सीमा पर रह रही 22 साल की विवाहिता नेहा डोगरा ने कहा, “जब भारत-पाक का विभाजन हुआ था तब यहां रतन साहेब नाम का एक गांव हुआ करता था। मेरी परदादी अपने बेटे के साथ खेत में काम कर रही थी, जब सीमा पार के कुछ लोगों ने उनका अपहरण कर लिया। उनके नन्हें बालक की हत्या कर दी गई और परिवार ने उन्हें दोबारा कभी नहीं देखा।”

तीन तरफ से पाकिस्तान से घिरा जम्मू के गांव अब्दुलियां में अप्रैल 2, 2018 को बैलगाड़ी पर सामान ले जाते स्थानीय लोग।

विभाजन और अपहरण के बाद

नेहा ने बताया, अपहरण से तंग आकर गांव को करीब एक कि.मी. दूर पुनरस्थापित कर दिया गया, लेकिन एक छोटा मंदिर और पीर बाबा अभी भी वहां हैं, जहां थे। लोहड़ी त्योहार के समय हर साल,नेहा और उनका परिवार  उस मंदिर में जाता है  जहां उनके समुदाय के लोग त्योहार मनाते हैं। जो कभी गांव का वास्तविक स्थान हुआ करता था वहां आज अब्दुलिया का आर्मी कैंप मौजूद है और मंदिर जाने के लिए आर्मी की अनुमति लेनी पड़ती है। नेहा ने बताया, “यह सीमा के बहुत नज़दीक है और इस वजह से यहां ख़तरा बना रहता है।”

नेहा परिवार की चौथी पीढ़ी हैं, जो दुनिया के इस हिस्से में कभी खत्म नहीं होने वाली सीज़फायर उल्लंघन और टकराव का सामना कर रही है । जनवरी 19 से 24 के बीच आर.एस पुरा में हालिया सीज़फायर उल्लंघन हुआ, जिसमें 2 किशोंरों को लेकर चार लोगों की मृत्यु हो गई। पिछले साल हुई गोली बारी में अब्दुलियां पोस्ट के दो जवान शहीद हो गए।

नेहा ने कहा, “जब मैं बच्ची थी तब भी गोलीबारी होती थी, जब मेरी शादी हो गई तब भी गोलीबारी जारी है और मुझे लगता है कि मेरे बूढ़े होने तक यह गोलीबारी चलती ही रहेगी।” नेहा ऐसी कहानियां सुनते हुए और गोलिबारी की घटनाओं, घायलों और हिंसा को देखते हुए इस कदर बड़ी हुई हैं कि अब यह उनके जीवन का हिस्सा बन गया है जो उनके लिए कभी भी सामान्य जीवन के रुप में नहीं हो सकता।

अप्रैल 2, 2018 को अब्दुलियां गांव में आर्मी बंकर के ऊपर बैठे ग्रामीण। तीनों तरफ से पाकिस्तान से घिरा यह गांव, जनवरी 19 से 24 के बीच  सीज़फायर उल्लंघन से लगातार जूझता रहा।

नेहा की दादी के पैर में गोली लगी थी और नेहा बेहतर ढ़ंग से बता सकती हैं कि उनकी दादी, जो तब नौजवान थी कैसे घिसटते हुए नज़दीकी बीएसएफ कैंप पहुंची, जो उन्हें अस्पताल लेकर गए। उन दिनों सीमा पर कोई बाड़ नहीं था और ज्यादा मदद भी उपलबद्ध नहीं थी।

नेहा की सास, कृष्णा देवी जो कि गांव के पंच की एक सदस्य हैं, उन्होंने बताया कि कैसे 1995 में भारत-पाक के बीच हुए युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने अब्दुलियन पोस्ट पर कब्जा कर लिया। उन्होंने कहा, “जब युद्ध विराम घोषित किया गया तो दोनों सेना अपने-अपने स्थान पर लौट गईं।”

2004 के आखिर तक भारत ने पाकिस्तान की तरफ से होने वाले हथियारों की तस्करी और सशस्त्र घुसपैठियों की घुसपैठ रोकने के लिए सीमा पर बाड़ निर्माण पूरा कर लिया। हालांकि, बाड़ सीधे तौर पर सीमा पर नहीं है। किसानों के खेत के माध्यम से गुजरते हुए—यह करीब 140 मीटर भीतर भारतीय सीमा में है।

बाड़ के माध्यम से खेत में जाने के लिए मानवयुक्त गेट से गुजरना पड़ता है और फसल देखने के लिए बाड़ के माध्यम से खेत जाने वाले अब्दुलिया गांव के किसी भी शख्स को जांच चौकी पर अपना पहचान पत्र जमा करना पड़ता है। नेहा ने कहा, “जब किसान गोलीबारी के बीच फंस जाता है, तब यह जवानों को उनकी मदद करने में सहायक होता है।”

अप्रैल 2, 2018 को अब्दुलियां के रहने वाले पवन कुमार पाक द्वारा दागी गई गोली और मोर्रटार दिखाते हुए। Pawan Kumar shows a shell and a bullet fired from across India’s border with Pakistan in Abdullian village in Jammu on April 2, 2018. (Venus Upadhayaya/NTD India)

नेहा के पड़ोसी, पवन कुमार कहते हैं, पिछले चार सालों में सीज़फायर उल्लंघन बहुत ज्यादा हुआ है। हालांकि, नेहा की दादी के समय से अलग, आज बीएसएफ और पुलिस के पास किसानों को बचाने के लिए बुलेटप्रूफ वाहन हैं। किसी भी समय सीज़फायर उल्लंघन के दौरान किसानों को बचाने के लिए आर्मी कैंप के बाहर बुलेटप्रूफ वाहन तैयार खड़ी रहती है।

सुरक्षित आश्रय के लिए बंकर मौजूद है

सीमा पर स्थित पांच गांवों के नागरिकों को पाकिस्तान की तरफ से होने वाली गोलीबारी से बचाने के लिए भारत सरकार 14,000 बंकर बनाने की योजना बना रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, व्यक्तिगत परिवारों के लिए 13,029 बंकर और 1,431 बड़े सामुदायिक बंकर जम्मू-कश्मीर के पांच ज़िलों, सांबा, पुंछ, जम्मू, कथुआ और रजौरी में बनाए जाएंगे।

ऐसे दो बंकर फिलहाल अब्दुलियां गांव में बने हुए हैं। हालिया सीज़फायर उल्लंघन के दौरान ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ वाहनों के आने से पहले इन बंकरों ने ग्रामीणों को सुरक्षा प्रदान की।

पवन के घर के ठीक सामने एक सामुदायिक बंकर बना हुआ है। गुलाबी दीवार के भीतर ठंडी स्थान की तरफ सीढ़ियां जाती हैं। हालांकि, एक कमरे की फर्श की सीमेंट उखड़ी हुई है, जबकि दूसरे कमरे की दीवारें नम है। कृष्णा देवी ने बताया कि बंकर के अंदर किसी भी तरह के ए.सी. या फिर पंखे की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने कहा, “लेकिन बच्चे यहां असहज महसूस करते हैं। पिछली बार जबतक हम इसके भीतर थें उन्होंने कुछ भी नहीं खाया।”

सामुदायिक बंकर, जो कि सीमा पार से होने वाली गोलीबारी से ग्रामीणों को बताता है, उसके सामने खड़ी नेहा डोगरा (बांयी तरफ), कृष्णा देवी (बांए से दूसरी), पवन कुमार (दाहिने से दूसरा) और अन्य ग्राीण Neha Dogra (extreme L), Krishna Devi (2 L), Pawan Kumar (2R) and other villagers in front of the community bunker that shelters them during firing from across the border. (Venus Upadhayaya/NTD India)

सामुदायिक बंकर की तरफ जाने पर जिसका रास्ता एक कैटल शेड से होकर गुजरता है और बंकर के प्रवेश द्वार के सामने एक सामुदायिक हॉल है जिसकी दीवारें गोलियों और मोर्रटार से टूटी हुई हैं, जिसे पवन के बुजुर्ग पिता ने दिखाया।

जीवन के लिए उत्साह!

सामुदायिक हाल के दूसरी तरफ मंदिर है और दाहिने तरफ एक दुकान है जिसकी शुरुआत में ही मिठाइयों की खाली डिब्बे हैं, जबकि भीतर एक शख्स स्थानीय स्वादिष्ट मिठाई पलंगथ्रोड (Palangthrod) बना रहे थे।

 

पवन कुमार के पिता सामुदायिक हॉल पर सीमा पार से हुई गोलीबारी और सेल द्वारा दीवार पर पड़ी निशान दिखाते हुए। Pawan Kumar’s father shows the community hall wall punctured by bullets and shells from across the border in Abdullian village in Jammu on April 2, 2018. (Venus Upadhayaya/NTD India)

अब्दुलियन गांव अपने पलंगथ्रोड के लिए काफी प्रसिद्ध है, जो कि मिल्क केक का एक प्रकार है, जिसे स्थानीय लोग गाय के दूध से बनाते हैं। किसी बाहरी के लिए गोलियों और गोलीबारी के बारे में बात करना अपरिहार्य है, लेकिन स्थानी लोगों के लिए अब्दुलियां के  पलंगथ्रोड की मिठास और इसकी सरज़मीं पर स्थित उस छोटे मंदिर और पीर बाबा पर आस्था भी चर्चा का विषय है।

नेहा ने कहा, “आप वो पीर बाबा देख रहे हैं। उनके पास विशेष शक्तियां हैं। एक बार एक मोर्रटार उन पर गिरने ही वाला था लेकिन हवा में ही फट गया और उन्हें कोई हानि नहीं पहुंची। तब से स्थानीय लोगों का मानना है कि पीर बाबा के पास विशेष शक्ति है।”

हालांकि गांव शक्ति और देवित्व पर भरोसा करता है, जिसकी व्यापकता और सुरक्षात्मकता, वे हर रोज़ शांति के लिए भी प्रर्थना करते हैं। वास्तव में ऐसा कहा जाता है कि शांति किसी भी सूरत में इतनी जल्दी नहीं आती। गोलीबारी और सीमा उनकी जिंदगी बन गई है। पवन ने ज़ोर देते हुए कहा, “चिंता तो बहुत ज्यादा है, लेकिन यदि मैं तनावग्रस्त रहुंगा तो बच्चों को कौन संभालेगा। हमें यहीं रहना है।”

चिंता यहां के लोगों की बहुआयामी सच्चाई है और विभिन्न परिस्थितियों में यह उम्मीद लेकर आती है। जैसे गोलीबारी ग्रामीणों को पलंगथ्रोड बनाने से नहीं रोक सकती, वैसे ही चिंता अब्दुलियन के लोगों को जीने से नहीं रोक सकती।

नेहा ने कहा, “जब मैं छोटी थी तब गोलीबारी के दौरान दादु (दादा) मुझे उम्मीद की रोशनी दिखाते थे और उससे मुझे हिम्मत मिलती थी…मेरे दादु यहां रहते थे। मेरे पास उनका घर और ज़मीन है जिसकी देखरेख करनी है।”


इस लेख को NTD स्टाफ रविचंद्र कुशवाहा द्वारा अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद किया गया है। 

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