गंगा किनारे बसे प्रत्येक शहर की अपनी अलग कहानी है, कोई प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण है, तो किसी शहर ने सहेज रखी है सांस्कृतिक धरोहर। आज हम इस लेख में गंगा के उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी में गिरने तक की राह में इसके तट पर स्थित कुछ महत्वपूर्ण स्थलों के बारे में बताने वाले हैं, जिनमें से कुछ के बारे में आप जानते होंगे, और कुछ अंजान स्थलों से हम आपका परिचय करा देते हैं।

गंगा, मोक्षदायिनी गंगा, यह सिर्फ एक नदी ही नहीं है, बल्कि अपने तट पर सहेजे हुए आस्था और इतिहास का प्रतीक है, जिसे भारत में मां का दर्जा प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि गंगा में डुबकी लगाने मात्र से इंसान के सभी पाप धुल जाते हैं, इस वजह से गंगा को “पतितपावनी” यानि कि सभी पापों से छुटकारा दिलाने वाली नदी के रुप में पूजा जाता है।

अपने उद्गम स्थल से लेकर सागर में मिलने तक गंगा कई महत्वपूर्ण घटनाओं की साक्षी बनी है, इसके विभिन्न तटों में से एक तट पर महाभारत की गाथा सुनाई गई थी, तो दूसरे तट को अंग्रेजों ने सुगम व्यापार का साधन बनाया।

1. गंगोत्री!

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गंगा के उद्गम स्थल को गंगोत्री कहा जाता है। गंगोत्री के जिस स्थान से गंगा का उद्गम हुआ है उसे गोमुख कहा गया है। समुद्र तल से करीब 3042 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस स्थान पर देवी गंगा को समर्पित एक मंदिर भी है। प्रत्येक वर्ष मई से अक्टूबर माह के बीच हज़ारों श्रद्धालु पतितपावनी देवी गंगा के दर्शन के लिए आते हैं। बात अगर देवी गंगा को समर्पित इस मंदिर की करें तो इसका निर्माण गोरखा कमांडर “अमर सिंह थापा” द्वारा 18 वीं शताब्दी की शुरूआत में किया गया था। वर्तमान मंदिर का पुननिर्माण जयपुर के राजघराने द्वारा किया गया था।

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मंदिर के साथ ही इस शहर का इतिहास अभिन्न रुप से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में इस स्थान पर कोई मंदिर नही था। “भागीरथी शिला” के निकट एक मंच था जहां यात्रा मौसम के तीन-चार महीनों के लिये देवी-देताओं की मूर्तियां रखी जाती थी इन मूर्तियों को गांवों के विभिन्न मंदिरों जैसे श्याम प्रयाग, गंगा प्रयाग, धराली तथा मुखबा आदि गावों से लाया जाता था जिन्हें यात्रा मौसम के बाद फिर उन्हीं गांवों में लौटा दिया जाता था।

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यहां आप वायु और सड़क मार्ग दोनों से पहुंच सकते हैं। वायु मार्ग से पहुंचने के लिए आप देहरादून स्थित जौलीग्रांट हवाई अड्डे का सहारा ले सकते हैं, जो यहां से करीब 266 कि.मी दूर है। सड़क मार्ग से पहुंचने के लिए आपको यहां के सभी प्रमुख शहरों से बसें मिल जाएंगी।

2. हरिद्वार!

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अपने उद्गम स्थल से करीब 250 किमी की यात्रा तय करके गंगा हरिद्वार पहुंचती है। यहां से गंगा का मैदानी भागों में सफर शुरु होता है, इस वजह से इसे “गंगा प्रवेश द्वार” भी कहा जाता है। यह स्थान हिन्दू धर्म के लिए पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है, यहां “हर की पौड़ी,” “चंडी देवी,” “मनसा देवी,” “सप्त ऋषि आश्रम” और “माया देवी मंदिर” जैसे प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां सालभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

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ऐसी मान्यता है कि हरिद्वार वह स्थान है, जहां समुद्र मंथन के बाद अमृत का घड़ा ले जाने के दौरान गलती से अमृत की कुछ बूंदें गिर गई थी। मान्यतानुसार, जिस स्थान पर अमृत की बूंदे गिरी थी उसे “हर की पौड़ी” कहा गया, जिसका मतलब है हरि का चरण यानि कि भगवान विष्णु का चरण। यहां पर एक कुंड है, जिसे “ब्रम्ह कुंड” कहते हैं, इसमें स्नान करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

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यहां आप तीनों मार्गों से पहुंच सकते हैं। वायु मार्ग से पहुंचने के लिए आपको देहरादून स्थित “जौलीग्रांट हवाई अड्डे” का सहारा लेना पड़ेगा। तो वहीं राष्ट्री राज्य मार्ग-58 से यह शहर पूर्णतः जुड़ा हुआ है, यहां के लिए आपको राजधानी दिल्ली से भी सीधी बसें मिल जाएंगी। बात अगर रेल मार्ग की करें तो यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन हरिद्वार में ही स्थित है, जहां से आपको देख के सभी प्रमुख शहरों की रेलगाड़ियां मिल जाएंगी।

3. शुक्रताल!

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गंगा तट पर बसा शुक्रताल प्राचीन पवित्र स्थल है, जिसका संबंध महाभारत काल से है। मान्यता है कि “राजा परीक्षित” को श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए “श्री शुक मुनि” ने “अक्षय वट” के नीचे बैठकर 88 हज़ार ऋषि-मुनियों के साथ मिलकर श्रीमदभागवत कथा सुनाई थी। पौराणिक मान्यता है कि इस वट के पत्ते पतझड़ के दौरान भी सूखकर नहीं गिरते। करीब छः हज़ार साल पुराना यह वृक्ष आज भी अपने युवावस्था में है। इस वट के नीचे एक सुखदेव मंदिर बनाया गया है। इसके अलावा यहां हनुमान जी की 72 फीट और भगवान गणेश की करीब 30 फीट ऊंची प्रतिमा भी है।

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अपनी धार्मिक महत्ता की वजह से यह स्थान पर्यटन का मुख्य केंद्र भी है। प्रत्येक वर्ष सावन माह में कावड़ मेले के दौरान हरिद्वार से कावड़ लेकर आने वाले भक्तों में से कुछ यहां भी आते हैं। यहां आने वाले भक्त यहां स्थित अक्षय वट की परिक्रमा करना नहीं भूलते।

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शुक्रताल आप सड़क और रेल दोनों मार्गों से पहुंच सकते हैं। यहां का नजदीकी रेलवे और बस स्टेशन मुज़्जफरनगर है। जहां से आपको शुक्रताल जाने के लिए संसाधन मिल जाएंगे।

4. वाराणसी!

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गंगा किनारे स्थित सबसे प्राचीन शहर वाराणसी के बारे में किसी को ज्यादा बताने की जरुरत नहीं है। वाराणसी को काशी और बनारस भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म में काशी को सर्वाधिक पवित्र स्थल के रुप में माना गया है। यहां स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर में सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां के सभी घाटों की अपनी अलग कहानी है। मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट बनारस स्थित सभी घाटों में से प्रसिद्ध घाट हैं।

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पौराणिक मान्यतानुसार इस शहर की स्थापना भगवान शिव ने की थी। यहां भगवान शिव का प्रसिद्ध “काशी विश्वनाथ मंदिर” स्थित है। विभिन्न पुराणों में भी काशी का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा काशी को सबसे प्राचीन शहर माना जाता है, करीब 3000 वर्ष पुराना। बात अगर यहां के पर्टन स्थलों की करें, तो यहां हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्मों के कई पवित्र स्थल हैं। यहां के सभी घाट तो आपको आकर्षित करेंगे ही, सारनाथ जाकर आप बौद्ध धर्म की एक झलक भी ले सकते हैं। यहां की गंगा आरती तो देश-विदेश में प्रसिद्ध है।

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वाराणसी तीनों मार्गों से बहुत अच्छे से जुड़ा हुआ है। हवाई मार्ग से पहुंचने के लिए आप “लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे” का सहारा ले सकते हैं, तो वाराणसी रेलवे स्टेशन भी देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। सड़क मार्ग से भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। यह शहर नेशनल और स्टेट हाई-वे दोनों से जुड़ा हुआ है।

5. कोलकाता!

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यहां पहुंचकर गंगा का नाम “हुगली” हो जाता है। कोलकाता को लंबे समय से अपने साहित्यिक, क्रांतिकारी और कलात्मक धरोहरों के लिए जाना जाता है। भारत की पूर्व राजधानी रहने से यह स्थान आधुनिक भारत की साहित्यिक और कलात्मक सोच का जन्मस्थान बना। यहां कई पर्टन स्थल है, जिनमें से विक्टोरिया मेमोरियल, हुगली नदी पर बना हावड़ा ब्रीज़, फोर्ट विलियम पार्क आदि को देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते रहते हैं। यहां स्थित काली घाट मंदिर में माता काली के प्रचंड रुप के दर्शन के लिए श्रद्धालु आते रहते हैं।

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कहते हैं कि हिन्दू देवी “काली” के नाम पर इस शहर का नाम कलकत्ता पड़ा। इसके अलावा भी इस शहर के नाम को लेकर कई कहानियां हैं, कहा जाता है कि अंग्रेज़ों ने इस शहर का नाम “कैलकट्टा” रखा था, यह शहर कभी उनका प्रमुख व्यापार स्थल हुआ करता था। ऐतिहासिक रूप से कोलकाता भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के हर चरण में केन्द्रीय भूमिका में रहा है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ-साथ कई राजनैतिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों जैसे “हिन्दू मेला” और क्रांतिकारी संगठन “युगांतर”, “अनुशीलन” इत्यादि की स्थापना का गौरव इस शहर को हासिल है।

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यातायात के सभी मार्गों से यह शहर जुड़ा हुआ है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस यहां का हवाई अड्डा है, तो “कलकत्ता” और “हावड़ा जंक्शन” यहां के बड़े रेलवे स्टेशनों में से एक हैं। सड़क मार्ग से भी कोलकाता जुड़ा हुआ है।

6. सुंदरबन!

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पश्चिम बंगाल में स्थित सुंदरवन 54 छोटे द्वीपों का समूह है। फोटोग्राफी के शौकीन लोगों के लिए सुंदरबन नेशनल पार्क बहुत ही बेहतर स्थान है। यहां कई प्रकार की अनोखी पक्षियों की प्रजातियाँ जैसे “मास्क्ड फिन्फूत,” “मैन्ग्रोव पित्त” और “मैन्ग्रोव व्हिस्टलर” देखने को मिल जाएंगी। यहाँ इस इलाके में विभिन्न प्रकार के पेड़ हैं जैसे सुंदरी और गोल्पत्ता। 1900 के प्रारंभ में, डेविड प्रिन नमक जीव-वैज्ञानिक ने सुंदरबन में 330 से भी अधिक पौधों की प्रजातियों की खोज की थी।

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