चिकित्सकों का मानना है कि देश में दवाओं के लिये परामर्श और वितरण को लेकर पुख्ता नीति के निर्माण और अनुपालन से जानलेवा बीमारी ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के पूरी दुनिया में टीबी के कुल मामलों में 23 फीसदी से अधिक भारत में थे। वर्ष 2016 में टीबी से 17 लाख बच्चों, महिलाओं और पुरुषों की मौत हुई हालांकि 2015 के मुकाबले इसमें चार फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। टीबी से मरने वाले मरीजों की संख्या एचआईवी पॉजिटिव लोगों की मृत्यु को छोड़कर 2015 में 478,000 तथा 2014 में 483,000 रही।

रिपोर्ट के अनुसार भारत, इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस, पाकिस्तान, नाइजीरिया और साऊथ अफ्रीका में इससे गंभीर रूप से प्रभावित है। भारत के अलावा चीन और रूस में 2016 में दर्ज किए मामलों में करीब आधे 4,90,000 मामले मल्टीड्रग-रेसिस्टैंट टीबी (एमडीअारटीबी) के हैं।

भारत में अगले दो दशकों में एमडीअारटीबी के मामलों में इजाफा होने की आशंका है। देश में वर्ष 2015 में एमडीआर टीवी के मामले 79 हजार थे जो 2016 में यह बढ़कर 84 हजार हो गये। ड्रग रेसिस्टैंट टीबी, टीबी का बिगड़ा रूप है जिसमें टीबी के बैक्टीरिया पर दवाएं असर नहीं करतीं। चिकित्सा पत्रिका लैंसेट में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक देश में वर्ष 2040 तक इस बीमारी के 10 में से एक मामले ड्रग रेसिस्टैंट टीबी के हो सकते हैं।

सिविल अस्पताल में वरिष्ठ परामर्शदाता और राजकीय चिकित्सा सेवा संघ के अध्यक्ष डा0 अशोक यादव ने इस बाबत ‘यूनीवार्ता’ से कहा कि एंटीबायोटिक के इस्तेमाल या गलत इस्तेमाल से जैसे कि गलत दवाओं का इस्तेमाल या चिकित्सक के परामर्शानुसार तय समय तक उपचार नहीं करने से बैक्टीरिया दवा प्रतिरोधक बन सकता है।

उन्होंने कहा कि दरअसल देश में दवाओं के परामर्श और वितरण को लेकर कोई पुख्ता नीति नहीं है अौर जो नियम भी है, उनका अनुपालन करने में घोर लापरवाही बरती जा रही है। पेट दर्द ,बुखार,खांसी और बलगम जैसी समस्याओं के समाधान के लिये लोगबाग अनुभवी चिकित्सक से परामर्श लेने के बजाय किसी की बताई हुई दवा अथवा मेडिकल स्टोर संचालक के परामर्श को तरजीह देते हैं।

चिकित्सक के अनुसार मनमाफिक एंटीबायटिक के इस्तेमाल से रोगी की प्रतिरोधक क्षमता में इजाफा होता है जिसका दुष्परिणाम होता है कि टीबी जैसी असाध्य बीमारी के लिये सुझायी गयी दवायें मरीज पर असर नहीं करती और धीरे-धीरे वह काल की ओर बढ़ता जाता है।

उन्होंने कहा कि आजादी के सात दशक के दौरान विभिन्न सरकारों ने टीबी के इलाज के लिये योजनायें बनायी और इस बीमारी से निपटने के लिये खासे बजट का भी इंतजाम किया मगर बीमारी के प्रति जागरूकता में कमी और झोला छाप डाक्टरों के इलाज ने सब किये कराये पर पानी फेर दिया। वर्ष 1962 में क्षय रोग चिकित्सा कार्यक्रम की शुरूआत की गयी जबकि 90 के दशक में राष्ट्रीय पुनरीक्षण कार्यक्रम के जरिये बीमारी की रोकथाम के प्रयास किये गये।

चिकित्सक ने कहा कि जिन देशों में टीबी के मामले ज्यादा है उनमें मुख्य रूप से बीमारी का पता लगाने की संरचना और इलाज करने की सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में योजनानुसार 2030 तक इसे खत्म करने में बहुत संघर्ष करना पड़ सकता है।

डा0 यादव ने कहा कि भारत में हर तीन ‍मिनट में दो मरीज क्षयरोग के कारण दम तोड़ दे‍ते हैं। हर दिन चालीस हजार लोगों को इसका संक्रमण हो जाता है। टी.बी. रोग एक बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण होता है। इसे फेफड़ों का रोग माना जाता है, लेकिन यह फेफड़ों से रक्त प्रवाह के साथ शरीर के अन्य भागों में भी फैल सकता है, जैसे हड्डियाँ, हड्डियों के जोड़, लिम्फ ग्रंथियाँ, आँत, मूत्र व प्रजनन तंत्र के अंग, त्वचा और मस्तिष्क के ऊपर की झिल्ली आदि।

उन्होंने कहा कि टी.बी. के जीवाणु साँस द्वारा शरीर में प्रवेश करते हैं। किसी रोगी के खाँसने, बात करने, छींकने या थूकने के समय बलगम व थूक की बहुत ही छोटी-छोटी बूँदें हवा में फैल जाती हैं, जिनमें उपस्थित बैक्टीरिया कई घंटों तक हवा में रह सकते हैं और स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में साँस लेते समय प्रवेश करके रोग पैदा करते हैं। रोग से प्रभावित अंगों में छोटी-छोटी गाँठ अर्थात्‌ टयुबरकल्स बन जाते हैं। उपचार न होने पर धीरे-धीरे प्रभावित अंग अपना कार्य करना बंद कर देते हैं और यही मृत्यु का कारण हो सकता है।

डब्लू एच ओ के आंकडों के मुताबिक वर्ष 2015 की तुलना में 2016 में टीवी के मामलों में हुई मौतों में 12 फीसदी की कमी आयी हालांकि 2106 में 1़ 7 मिलियन नये मामलो में भारत सबसे आगे था। गिरावट के बावजूद विश्व के कुल रोगियों का 32 प्रतिशत भारत में है। क्षय रोग में वृद्धि का कारण उच्च निगरानी तंत्र और मृत्यु में आने वाली कमी है।

रिपोर्ट के अनुसार ड्रग प्रबंधन में सुधार के कारण 2015 में क्षय रोगों से मरने वाले 480000 थी जबकि 2016 में यह तादाद घटकर 423000 रह गयी। केन्द्र सरकार ने 2035 तक 90-90-90 लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रतिबद्धिता जाहिर की है। इसका तात्पर्य है कि क्षय रोग के कारण होने वाली घटनाओं,मृत्यु दर और स्वास्थ्य व्यय में 90 प्रतिशत कमी लायी जायेगी।

चिकित्सकों के अनुसार टीबी के कारण 95 प्रतिशत मौतें विकाशसील देशों में होती है। इसके लिये ध्रूमपान मुख्य रूप से जिम्मेदार है। टीबी के फैलने का एक मुख्य कारण इस बीमारी के लिए लोगों सचेत ना होना और इसे शुरूआती दौर में गंभीरता से ना लेना है। टी.बी किसी को भी हो सकता है, इससे बचने के लिए कुछ सामान्य उपाय भी अपनाये जा सकते हैं।

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