बिहार के लेखक किसान, गिरीन्द्रनाथ झा का जन्म भले ही पूर्णिया में हुआ था, पर उनके किसान पिता ने उन्हें हमेशा अपने गाँव से दूर रखा। हर पिता की तरह वे भी अपने बेटे को जीवन में सफल होते देखना चाहते थे और हमारे समाज में किसान को असफलता का ही प्रतिरूप माना जाता है।

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गिरीन्द्रनाथ ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के सत्यवती कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक किया और फिर प्रिंट मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसके बाद वे आईएनए न्यूज़ सर्विसेज से जुड़ गए। तीन साल दिल्ली में काम करने के बाद गिरीन्द्रनाथ ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही कंप्यूटर साइंस में स्नातक कर चुकी प्रिया को अपनी जीवनसंगिनी बनाया। इसके बाद उन्हें दैनिक जागरण अखबार में नौकरी मिल गयी और ये जोड़ा कानपूर में बस गया और आज इनकी एक प्यारी बेटी है जिसका नाम पंखुड़ी है।

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हालाँकि गिरीन्द्रनाथ का मन अभी भी गाँव में ही बसता था। इसलिए 2006 से ही जब-जब वे गाँव जाते वहां कुछ कदंब के पेड़ ज़रूर लगा आते। उनके दिमाग में गाँव में एक ऐसा घर बनाने का सपना पनपने लगा जहाँ शहरों के लोग भी आकर रहने को उत्सुक हों।

हर छुट्टी पर गाँव आकर पेड़ लगाने का सिलसिला यूँही चलता रहा पर गिरीन्द्रनाथ अपने बाबूजी के आगे गाँव में ही बस जाने की बात का उल्लेख न कर सके। 2012 में जब गिरीन्द्रनाथ अपनी पत्रकारिता के करियर के शिखर पर थे, अचानक एक दिन उन्हें अपने बाबूजी के ब्रेन हैमरेज होने की खबर मिली।

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गिरीन्द्रनाथ तुरंत अपने परिवार समेत चनका की ओर रवाना हो गए और इसके बाद बाबूजी की सेवा और उनके पुश्तैनी 17 बीघा ज़मीन की देख-रेख के लिए गाँव में ही बस जाने की जिद्द करने लगे। उनकी जिद्द के आगे उनके बाबूजी की एक न चली।

गिरीन्द्रनाथ की पत्नी प्रिया ने भी इस फैसले में उनका पूरा साथ दिया। दिल्ली के किसी बड़े मॉल के कॉफ़ी शॉप से शुरू हुई यह प्रेम कहानी अब चनका के खेत खलिहानों तक पहुँच गयी थी। पर अचरज यह था कि जहाँ युवा पीढ़ी आज गाँव से पलायन करने का बस मौका भर ढूंढ़ती है वहीं ये युवा जोड़ा शहर की चकाचौंध को छोड़ यहाँ गाँव की पगडंडियों में बेहद खुश था।

गिरीन्द्रनाथ अब अपने गाँव तो आ गए थे पर अब भी उनका शहर को गाँव की ओर खींचने का सपना अधुरा था। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले गाँव से शहरों की ओर हो रहे पलायन को रोकने की ठानी। जिन-जिन परिवारों को ज़मीन खो देने की वजह से गाँव से पलायन करना पड़ रहा था उन परिवारों के आगे गिरीन्द्रनाथ ने अपनी ज़मीन पर खेती करने का प्रस्ताव रखा। इस तरह गाँव में साझेदारी पर खेती होने लगी। पर खेती में नुकसान होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण था नशा। गांव के कई पुरुषों को पीने की लत थी, जिसके चलते वे जितना कमाते सब इस लत के ऊपर खर्च कर देते।

अब तक गाँव के करीब 600 बच्चों से गिरीन्द्रनाथ की पक्की दोस्ती हो चुकी थी। वे उन्हें रोज़ पढ़ाते थे। इसी बात का उल्लेख उन्होंने पटना यूनीसेफ (UNICEF) द्व्रारा आयोजित एक समारोह में किया। उन्होंने आग्रह किया कि यूनीसेफ का अगला फिल्म फेस्टिवल किसी बड़े शहर के बजाय चनका में किया जाये। गिरीन्द्रनाथ की कोशिश सफल हुई और 2015 का यूनीसेफ का बाल चित्र महोत्सव चनका में आयोजित किया गया।

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इसके बाद गिरीन्द्रनाथ ने मीडिया को चनका बुलाने का सिलसिला जारी रखा। वे हर साल यहाँ सोशल मीडिया मीट करते है जिसमे पत्रकारों और कलाकारों के अलावा गाँव के भी लोग आलोचनाओं में शामिल होते है। इससे शहर और गाँव दोनों को ही एक दूसरे को जानने का मौका मिलता है।

वे अपने ब्लॉग “अनुभव” के ज़रिये लोगो तक चनका की बातें पहुंचाते रहे। अनुभव को साल 2015 में एबीपी न्यूज़ और दिल्ली सरकार की ओर से सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग का भी सम्मान प्राप्त है। इसके अलावा गिरीन्द्रनाथ राजनितिक और सामाजिक विषयों पर एनडीटीवी, बीबीसी और जागरण जैसी कई अखबारों और न्यूज़ वेबसाइट के लिए लिखते है। इससे वे बाहरी दुनियां से खुद भी जुड़े रहते हैं और चनका को भी जोड़े रखते हैं।

 

 

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