हर साल सितम्बर 5 को “शिक्षक दिवस” पर स्कूल के बच्चों को शिक्षक बनने का मौका मिलता है। 10वीं से 12वीं क्लास के बच्चे 5वीं से 9वीं क्लास के बच्चों को पढ़ाते हैं। क्लास ख़त्म होने के बाद असली टीचर क्लास में आते हैं और शिक्षक बने बच्चों को गुलाब के फूल देकर “शिक्षक दिवस” की बधाई देते हैं। वास्तव में यह विचार बहुत ही अनूठा है जो छात्र और शिक्षक को और करीब लाते हैं ।

आज हम बात करेंगे एक ऐसे शख्स की, जिन्होंने चपरासी के तौर पर एक स्कूल में नौकरी शुरू की और अपनी मेहनत और लगन के कारण उन्हें प्रिंसिपल बनाया गया। यह कहानी है पुणे के मॉडर्न स्कूल के प्रिंसिपल सतीश गवली की।

Credit: The Better India

सतीश गवली ने अपने मामा के पास रहकर चौथी कक्षा तक पढ़ाई की और फिर वे अपने गाँव में सातवीं तक पढ़े। इसके बाद उन्हें हॉस्टल भेज दिया गया। सतीश गवली बताते हैं, “उस समय हॉस्टल की फीस 10 रुपये महीना थी। इसमें रहना-खाना सब था लेकिन हमारे परिवार के लिए यह फीस भी एक बड़ी कीमत थी। एक वक़्त तो ऐसा भी लगा कि पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी।”

सतीश आदिवासी समुदाय से थे लेकिन इस बात से बेखबर थे कि सरकार उनके समुदाय के लोगों को कई तरह की सुविधाएँ देती है। जब उन्होंने 11वीं कक्षा में दाखिला लिया, तब स्कूल के एक क्लर्क ने बताया कि वो छात्रवृत्ति के लिए योग्यता रखते हैं। सतीश कहते हैं, “मुझे 450 रुपए की छात्रवृत्ति मिली। यह मेरे लिए बड़ी बात थी। मैंने अपने जीवन में 100 रुपए नहीं देखे थे।” उसी दौरान सतीश को एक हाईस्कूल में चपरासी की नौकरी मिल गयी। इस नौकरी में उन्हें 900 रुपये तनख्वाह मिलने लगी।

22 साल की उम्र में सतीश की शादी हो गयी। सतीश अपनी पत्नी के साथ पुणे चले गए। उनकी पत्नी पुणे के पिंपरी म्युनिसिपल कारपोरेशन में काम करती थीं। अगले कुछ साल दोनों के लिए काफी कठिन थे। दोनों रोजाना 80 किलोमीटर की यात्रा करके अपने ऑफिस तक आते-जाते थे। हालाँकि इस मुश्किल समय में भी सतीश ने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। उन्होंने इतिहास और मराठी में बीए किया और फिर डबल एमए किया।

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इस दौरान उन्हें प्रमोशन देकर चपरासी से टीचर बना दिया गया। आखिरकार वो समय भी आ गया जब साल 2003 में सतीश गवली को स्कूल का प्रिंसिपल बनाया गया। पढ़ाई के लिए इस ललक ने उन्हें साल 2016-2017 में महाराष्ट्र का पहला “आदर्श शिक्षक” का तमगा भी दिलाया।

एक प्रिंसिपल के तौर पर सतीश ने अपने मॉडर्न स्कूल में कई नए प्रयोग किये जिन्हें काफी सराहना भी मिली। उन्होंने कक्षा 5, 6 और 7 के लिए शनिवार को “नो बुक डे” शुरू किया। इसकी जगह शनिवार को “इंटरेक्शन डे” शुरू किया गया जिसमें बच्चों से उनके ग्रेड के बारे में बातचीत होती है।

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गवली ने गरीबी देखी थी, इसलिए उन्होंने अपने स्कूल स्टाफ के साथ हर साल 20 बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का जिम्मा भी लिया है। गवली बच्चों को छोटे-छोटे हुनर सिखाने में भी मदद कर रहे हैं जैसे कि स्कूल में बच्चों को पेपर बैग बनाना सिखाया जा रहा है। इससे प्लास्टिक का इस्तेमाल कम होगा और बच्चों का पर्यावरण से प्यार बढ़ेगा।

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