यह कहानी उस लड़की की है जिसने बचपन से ही अपने जीवन में अनेकों मुश्किलों का सामना किया। हम लगभग 12 वर्ष की आयु में बाल विवाह, ससुराल वालों का अत्याचार और सामाजिक पीड़ा सहन कर चुकी कल्पना सरोज की बात कर रहे हैं जिन्होंने अपनी जिन्दगी के दुखों से तंग आकर आत्महत्या कर अपना जीवन समाप्त करने की कोशिश भी की थी। कल्पना सरोज का बचपन बहुत सघंर्षशील रहा । रोज़ाना दो रूपए कमाने वाली कल्पना सरोज आज 500 करोड़ रूपए के बिज़नेस की मालकिन हैं । कल्पना सरोज बहुत सारी कंपनियो की मालकिन हैं जैसे कमानी स्टील्स , कल्पना बिल्डर आदि।

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Credit: Meri Jivani

कल्पना सरोज का जन्म सन 1961 में महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में दलित परिवार में हुआ। कल्पना सरोज के घर की हालत कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी जिसके कारण वे अपने घर का गुजारा चलाने के लिए गोबर के उपले बनाकर बेचा करती थीं। कल्पना गांव के स्कूल में ही पढ़ने जाया करती थीं। स्कूल में भी कल्पना को उपेक्षा झेलनी पड़ती थी। मात्र 12 वर्ष की आयु में कल्पना जी की शादी उससे दस साल बड़े आदमी के साथ कर दी गई। शादी के बाद कल्पना को घरेलू हिंसा का शिकार भी होना पड़ा था| एक बार जब कल्पना सरोज जी के पिता जी उनसे मिलने आए तो उनसे उनकी यह हालत देखी नहीं गई और वे उन्हें गांव वापिस लेकर चले गए। गांव आने के बाद कल्पना और उसके परिवार को बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था| उनके परिवार का हुक्का पानी बंद कर दिया गया था। इसके बाद कल्पना अपनी जिन्दगी के दुखों से इतनी तंग आ चुकी थी कि उन्होंने ज़हर पीकर अपनी जीवन-लीला समाप्त करने की कोशिश की थी परन्तु परमात्मा को कुछ और ही मंजूर था और उनकी जान बच गई थी।

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Credit: नारी उत्कर्ष

इसके बाद से ही कल्पना सरोज की जिन्दगी में एक बड़ा बदलाव हुआ। उनके अंदर कुछ करने की सोच उमड़ पड़ी और उन्होंने मुंबई जाने का फ़ैसला कर लिया। कल्पना को केवल कपड़े सिलाई का काम आता था इसीलिए मुंबई में उनके चाचा ने उन्हें कपड़े की मिल में काम दिला दिया। इस काम के बदले उन्हें रोजाना के दो रूपए मिलते थे जो उनके लिए काफ़ी कम थे। इसके बाद कल्पना ने लोन लेकर कुछ सिलाई मशीनें और कुछ अन्य सामान खरीदा और एक बुटीक शॉप खोल ली। दिन रात की कड़ी मेहनत से उनकी यह दुकान चलने लगी और अब वे अपने परिवार वालों को भी पैसे भेजने लगी थी।

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Credit: Femina

सिलाई के पैसों में से कुछ बचत करके कल्पना ने फर्नीचर स्टोर खोला ये उनके लिए काफी फायदेमंद साबित हुआ। इसके साथ कल्पना जी ने एक ब्यूटी पार्लर भी खोला जिसमें कल्पना लड़कियों को ब्यूटी पार्लर का काम सिखाया करती थीं । कल्पना ने कंपनी के कर्मचारियों के साथ मिलकर हौंसले और कड़ी मेहनत के दम पर 17 वर्षों से बंद पड़ी एक कंपनी खरीदकर उसमें जान फूंक दी थी। इस कंपनी में आने के बाद उन्होंने सभी कर्मचारियों को उनके अनुसार काम पर लगाया।

दिन रात की कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार कल्पना ने कंपनी के सभी विवादों को सुलझा दिया और अपनी मेहनत के दम पर महारष्ट्र के वाडा में सफ़लता की एक मीनार खड़ी कर दी। कल्पना जी सन 2000 से कंपनी के लिए लड़ रही थीं । सन 2006 में कल्पना जी को कोर्ट के आदेश के अनुसार कमानी इंडस्ट्रीज़ का मालिक बना दिया गया। मालिकना हक मिलने के बाद कल्पना ने अपनी मेहनत के दम पर कंपनी को फायदेमंद कंपनी बना दिया।

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Credit: AajTak

यह कल्पना सरोज की मेहनत का ही कमाल है कि आज कमानी ट्यूब्स कंपनी 500 करोड़ तक की कंपनी बन गई है। कल्पना बताती है कि उन्हें ट्यूब बनाने की बिल्कुल भी जानकारी नही थी परन्तु उनके सीखने के जज़्बे और कर्मचारियों के सहयोग के साथ आज उन्होंने इस कंपनी को सफ़ल बनाया।

कल्पना को1999 में सावित्री फुले आदर्श महिला पुरस्कार महाराष्ट्र के आईजी श्री सुरादकर से मिला। 2001 में माता सावित्री ज्योतिबा फुले अवॉर्ड मिला, जो पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने दिया था। हाल ही में सफल बिजनेस वुमन के लिए उन्हें राजीव गांधी अवॉर्ड मिला था। बिजनेस के अलावा कल्पना को शिक्षा के क्षेत्र में भी दिलचस्पी है। करीब दो हजार छात्र शिक्षा के क्षेत्र में उनके कार्यक्रमों से लाभ उठा रहे हैं। कल्पना कहती हैं, “मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं इस मुकाम को हासिल करूंगी। वो इच्छाएं जो कभी मेरी थी ही नहीं, पूरी हो चुकी हैं। मैं जो कुछ भी हूं, वक्त और हालात के कारण हूं। हाँ, इसमें मेहनत, लगन और निष्ठा ज़रूर मेरी है। मेरा मानना है कि सच्ची लगन से सभी इच्छाएं पूरी हो सकती हैं।”

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Credit: Making India

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