किसी ने सच ही कहा है, “हारने का डर अपने जीतने के उत्साह से ज्यादा न होने दें।” लक्ष्य के प्रति समर्पित इंसान के लिए विफलता जैसी कोई चीज नहीं होती। ऐसे ही लड़की हैं अंकिता जैन जिसने सिर्फ सपने ही नहीं देखे बल्कि अपने सपनों का दिन-रात पीछा भी किया और 15 घंटे काम करने के बावजूद अपने पायलट बनने के सपने को साकार किया। 

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मुंबई की अंकिता जैन शुरू से ही पायलट बनना चाहती थीं जब उन्होंने अपने इस सपने को अपने पिता से कहा तो उन्होंने अपनी असमर्थता जताई क्योंकि वे जो अमेरिका से प्रशिक्षण लेना चाहतीं थीं उस कोर्स के लिए ₹25 लाख की जरूरत थी। और इतनी ज्यादा रकम उनके पास नहीं थी। फिर भी अंकिता ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी माँ से इस बारे में बात की।  माँ ने उन्हें सपोर्ट करते हुए अपने पति को लोन लेने के लिए मनाया और अंकिता को प्रशिक्षण के लिए अमेरिका भेजा।

अमेरिका में प्रशिक्षण के बाद अंकिता ने यहाँ नौकरी के लिए आवेदन करना शुरू कर दिया। लेकिन दुर्भाग्यवश अंकिता को दो साल तक नौकरी नहीं मिली। वे निराश होकर घर बैठ गयीं। उन्हें यह जिंदगी एक बोझ की तरह लग रही थी ऊपर से रिश्तेदारों के तानों से वे बहुत परेशान हो गयी थीं। कुछ लोग उनके पिताजी को कहते थे कि, “लड़की के शिक्षा पर बहुत अधिक खर्चा कर दिया।” तो कोई कहता, “लड़की को डॉक्टर बनाना चाहिए था।” एक समय बाद तो वे इन बातों पर विश्वास ही करने लग गयी थीं।

वह एक बहुत ही बुरा दौर था और अंकिता जल्द से जल्द इस दौर से उबरना चाहती थी। इसलिए उन्होंने किसी भी पद के लिए आवेदन करना शुरू कर दिया। अंकिता ने एयर होस्टेस पद के लिए चार बार आवेदन किया लेकिन चारों बार निराशा हाथ लगी लेकिन पांचवे प्रयास में अंकिता ने बाजी मार ली और वे सफल हो गयीं।

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अंकिता की कमाई शुरू हो चुकी थी और वे अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में अपनी सेवाएं दे रही थीं। लेकिन अंकिता इससे संतुष्ट नहीं थीं क्योकि उनका लक्ष्य खुद को पायलट की वर्दी में देखना था। उन्हें पता था एयर होस्टेस रहते वह कभी पायलट नहीं बन सकतीं। क्योकि पायलट बनने के लिए उन्हें पांच परीक्षाएं और पास करनी थीं। इसलिए उन्होंने पढ़ाई को अधिक समय देने के लिए ग्राउंड स्टाफ पद के लिए आवेदन किया।

एक साक्षात्कार के दौरान अंकिता ने कहा, “मेरे पास 12 घंटे की शिफ्ट थी और 3 घंटे का यात्रा समय, मुझे यकींन नहीं था कि मैं 15 घंटे तक कैसे काम करुँगी। और उन लोगों से कैसे प्रतिस्पर्धा करुँगी जो पूरे दिन तैयारी कर रहे हैं। लेकिन मुझे ऐसा करना पड़ा। मैंने सचमुच ट्रेनों, बसों, भोजन और यहाँ  तक कि वाशरूम के अंदर भी अध्ययन किया।”

यह “अभी नहीं या फिर कभी नहीं” वाली परिस्थिति थी — पायलट बनने के लिए एक साल में सिर्फ दो ही स्थान रिक्त थे और इसे वे खोना नहीं चाहतीं  थीं।

आख़िरकार अंकिता ने अपनी पायलट बनने की परीक्षा दे दी। वे कहती हैं, “मुझे याद हैं जब मैं अपने परिणाम की प्रतीक्षा कर रही थी,  मेरे बैंक खाते में केवल ₹600 थे। और मुझे यह नहीं पता था कि पायलट प्रशिक्षण के लिए ₹25 लाख का जो शुल्क अदा किया है उसका भुगतान मैं कैसे करुँगी। जिसके लिए मैंने हामी भर दी थी। मेरे माता-पिता ने भी उम्मीद छोड़ दी थी और इसके बाद वे मेरे लिए लड़को की तलाश करने वाले थे और अपनी सारी बचत को मेरी शादी में खर्च करना चाहते थे।”

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“लेकिन मुझे नहीं पता आप इसे क्या कहेंगे, शायद एक चमत्कार या फिर कानून का आकर्षण। मैंने उस परीक्षा में पूरे भारत में टॉप किया और अपने  प्रशिक्षण के लिए पूर्ण छात्रवृत्ति प्राप्त की।”

आखिरकार अंकिता ने अपने सपने को साकार करते हुए पायलट की वर्दी पहन ही ली। उनकी पहली उड़ान बड़ौदा के लिए थी। जब वे बैग लेकर ट्रिप पर चढ़ी तो सारे लोग अंकिता को देख रहे थे क्योंकि उन्हें महिला पायलट को देख कर गर्व हो रहा था। एक छोटी बच्ची द्वारा उनसे ऑटोग्राफ भी माँगा गया था क्योंकि उस बच्ची को लगा कि शायद वे प्लेन की कप्तान हैं।

अगर अगली बार आपको अपने सपने को साकार करने के लिए कुछ परेशानी हो रही है तो इस साधारण लड़की की कहानी को याद रखें जिसने असाधारण सपने को सच किया।

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