झारखंड के वरिष्ठ आईएएस अफसर कैलाश कुमार खंडेलवाल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की शानदार नौकरी और बेदाग करियर के बाद जल्द ही नौकरी छोड़ने का कठिन फैसला लिया है। जब कोई प्रशासन के सबसे ऊंचे पद से महज एक कदम दूर हो तो वह आखिर पद से इस्तीफा देना क्यों चाहेगा?

गिरिडीह में जन्में और स्थानीय कॉलेज में आरंभिक शिक्षा ग्रहण करने वाले केके खंडेलवाल ने 1981 में आईआईटी खड़गपुर से बीटेक (ऑनर्स) किया। आईआईटी प्रवेश परीक्षा में उनका ऑल इंडिया 52वां रैंक था। इसके बाद वे वर्ष 1987 में आईएएस की प्रतियोगिता परीक्षा में ऑल इंडिया में आठवां रैंक प्राप्त कर आईएएस बने।

जुलाई 2022 में रिटायर होने वाले खंडेलवाल को दिसंबर 2018 से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मिल गई। जनवरी 2019 से वे एक शिक्षक की भूमिका में नजर आएंगे। वे आईआईटी में प्रवेश के लिए छात्रों को तैयार करेंगे।

के के खंडेलवाल ने इसकी शुरुआत अपने घर से ही की है। अपने दो बेटों और एक भांजे को आईआईटी प्रवेश परीक्षा की तैयारी खुद कराई। पहले बड़े बेटे अंकुर ने 2011 में सफलता पायी। फिर 2013 में छोटे बेटे अनुपम ने देशभर में 99वां रैंक लाकर प्रवेश पाया। भांजे अंकित को ऑल इंडिया में 56वां रैंक मिला। भौतिक और गणित में बेटे और भांजे को टॉपर के समकक्ष अंक मिले थे।

के के खंडेलवाल के वीआरएस के फैसले से सबको हैरानी हुई। अपर मुख्य सचिव तक पहुँचने के बाद भी अगर करियर बेदाग रहे तो मुख्य सचिव के पद तक पहुंचने का रास्ता आसान हो जाता है। एेसे वक्त आपने यह फैसला क्यों लिया, इसके जवाब में खंडेलवाल कहते हैं, “मुझे बच्चों को आईआईटी में प्रवेश की तैयारी कराने में काफी आनंद आता है। बच्चों को कांसेप्ट की गहराई में जाकर गुणवत्ता पूर्ण विषय की जानकारी देना अच्छा लगता है।इसी जुनून ने मुझे इस फैसले के लिए प्रेरित किया। मेरा मानना है कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण विज्ञान और गणित विषय पढ़ाई जाये तो आईआईटी में प्रवेश कोई कठिन नहीं होता है।”

खंडेलवाल ने बताया, “जब बड़े बेटे अंकुर को तैयारी के लिए कोचिंग कराई तो इस दौरान उसे क्वालिटी की पढ़ाई नहीं मिली। फिर कोटा भेजा। लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिली तो खुद पढ़ाने का फैसला लिया। इसके लिए छुट्टी ली। पहले खुद तैयारी की और फिर बेटे को तैयार किया और उसे सफलता भी मिली।”

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