इरादा पक्का हो, तो सपने साकार होते देर नहीं लगती। जब रवि ने इरादा बनाया, तो घर में विरोध हो गया लेकिन फूलों में जिंदगी की राह चुनने के लिए रवि अड़ गए। जब उनके आंगन में फूलों की महक बिखरी, तो दूर-दूर तक गई। एमबीए करने के बाद पचास हजार की नौकरी छोड़ किसान बने रवि की पहचान अब अलग है। दो बीघा से शुरू हुआ कारोबार अब बीस बीघा तक पहुंच गया है।

Image result for रवि पाल गेंदे के फूलों की खेती
Credit: Google Plus

विकास खंड सुल्तानगंज के गांव छिवकरिया से प्रारंभिक शिक्षा लेने वाले रवि पाल ने मथुरा के सचदेवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से एमबीए की डिग्री हासिल की थी। वर्ष 2013 में उन्हें अपनी पहली नौकरी ₹20 हजार मासिक की मिली थी। इसके बाद वे नोएडा में टाटा मोटर्स के बिजनेस एरिया मैनेजर बन गए। पचास हजार रुपये महीने की नौकरी करने के दौरान रवि एक दिन घूमते-घूमते कृषि विज्ञान केंद्र दिल्ली गए। जब वे वहां वैज्ञानिकों से मिले तो कुछ अलग करने की सोच जो इतने दिनों से उनके दिल में थी वह पक्के इरादे में बदल गई। उन्होंने अपने गांव की मिट्टी में ही खेती कर मुनाफा कमाने का गुर सीखा।

वैज्ञानिकों की सलाह पर रवि ने छिवकरिया गांव में फूलों की खेती करने का फैसला ले लिया। दिसंबर 2014 में उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अपने गांव लौट आए। यहां खेती करने का फैसला परिवार को सुनाया तो पिता वेदराम पाल ने उनका विरोध किया लेकिन जब रवि नहीं माने, तो पिता ने यह कहकर छूट दे दी कि चार दिन खेतों में काम करने के बाद किसानी का भूत सिर से उतर जाएगा।

परिवार की 20 बीघा जमीन में से पहली बार में उन्होंने दो बीघा में गेंदे के फूल की खेती की। पांच माह में ₹75 हजार की आमदनी हुई तो रवि का हौसला भी बढ़ा। रवि छह बीघा में गेंदे की खेती कर रहे हैं। रवि बताते हैं कि गेंदे की फसल चार से पांच महीने में तैयार हो जाती है। साल में वे गेंदे की दो फसलें लेते हैं। हर फसल से उन्हें दो लाख रुपये का फायदा होता है।

Image result for रवि पाल गेंदे के फूलों की खेती
Credit: Google Plus

रवि को सफल होता देख क्षेत्र के कई किसान उनसे जुड़े और वे भी अब फूलों की खेती कर रहे हैं। रवि की तैयारी इस बार बीस बीघा जमीन पर फूलों की खेती करने की है। वे कहते हैं कि फूलों की खेती से इतना फायदा हुआ है कि अब काम के लिए भटकना नहीं पड़ता है। आसपास के कई किसान उनसे फूलों की खेती का तरीका सीख अपने खेतों में भी फूल उगा रहे हैं। रवि ने पहली बार जब देसी गेंदा लगाया था तो पैदावार ज्यादा अच्छी नहीं हुई थी। कृषि वैज्ञानिकों की सलाह पर उन्होंने थाईलैंड से बीज मंगवाये, जिसकी पैदावार देसी गेंदे की अपेक्षा पांच गुनी थी। अब वे हर साल थाईलैंड से ही बीज मंगाते हैं। ये बीज वे अन्य किसानों को भी देते हैं।

Image result for रवि पाल गेंदे के फूलों की खेती
Credit: ground zero

गेंदे के फूलों की सभी शहरों में भारी मांग है। रवि फूलों को आगरा और कानपुर की मंडियों में भेजते हैं। वे बताते हैं कि फूलों की मांग इतनी अधिक है कि अगर वे लगभग दस हेक्टेअर जमीन पर फूल उगाएं, तब जाकर यह मांग पूरी की जा सकेगी। रवि की युवा सोच को यूं तो जिले स्तर पर कई बार सम्मानित किया जा चुका है। जुलाई 2016 में तत्कालीन मंडलायुक्त प्रदीप भटनागर ने भी उन्हें सम्मानित किया था।

Share

वीडियो

Ad will display in 10 seconds