आज अगर शहरी बच्चों से किसानों के ऊपर एक लेख लिखने को कहा जाए तो वे शायद ही यह कर पाएं और अगर इंटरनेट के माध्यम से उन्होंने गलती से भी उसे लिखने की कोशिश की तो उनकी कलम भी तथाकथित लोकतंत्र के खिलाफ आग उगलेगी। इसका कारण है आज के किसान की स्थिति, जो अब किताबों से निकलकर क्रांति की गलियों तक पहुंच चुकी है। और हो भी क्यों न, स्थिति इतनी जटिल हो चुकी है कि हर साल कई किसान बढ़ते ब्याज के कारण अपनइ गाँव छोड़ कर शहर का रुख कर रहे हैं।

देश भर के किसान अब किसानी छोड़ शहरों की ओर रूख कर रहे हैं, उन्हीं में से एक है महाराष्ट्र के ओसमनाबाद का मोहन, जो चार वर्ष पहले एक बेहतर भविष्य की तलाश में, अपने परिवार के साथ महानगरी आ पहुंचा। बेटर इंडिया के अनुसार, मुंबई आने से पहले उसके पिता के पास दो एकड़ जमीन थी जिससे परिवार का गुजारा बड़ी ही मुश्किल से होता था। फिर एक बार सूखे ने ऐसी कयामत बरसाई की मोहन का परिवार लगभग रोड पर आ गया।

कर्ज इतना बढ़ गया कि वहाँ से निकलने के अलावा और कोई चारा नहीं था। कुछ वर्ष पहले एक ट्रेन हादसे में मोहन के पिता एक पैर खो चुके थे। एक दिन जब मोहन के पिता ने यह तय किया कि वे सब कुछ बेचकर शहर की ओर रवाना होंगे। एक अरसे से पढ़ाई से दूर रहे मोहन की आँखों में शहर के नाम पर फिर से चमक आ गई। उसके पिता ने सारी जमीन बेच दी, लेनदारों का कर्ज चुकाया और सपरिवार शहर की ओर रूखसत हो गए।

मोहन को लगा कि अब शहर में इतना तो कमा ही सकते हैं कि वह और उसका भाई पढ़ाई कर सकें। लेकिन शहर की सच्चाई कितनी भयानक होती है उसे अंदाजा तक नहीं था। जब वे सभी शहर पहुंचे तो उनको अपने सिर के ऊपर एक स्थायी छत तक नहीं मिली। फिर उनको एक ऐसी छत मिली जहाँ उनके जैसे कई परिवार अपनी रात बिताते थे और वो था तीन हाट नाका फ्लाई-ओवर।

अगली सुबह मोहन काम की तलाश में निकल पड़ा। सड़कों पर खड़े होकर गजरे बेचता और लोगों से उसे खरीदने की मिन्नतें करता था। दो वर्ष ऐसे ही बीत गये और पढ़ाई करने का उसका सपना किसी स्याह अंधेरी रात में चादर ओढ़कर सो गया। उसे अब जिंदगी की असली सच्चाई का पता चल गया।

उसने जिंदगी के इस कड़वे घूंट को पी लिया और अब यह मान लिया कि सुबह से शाम तक मेहनत करके रोटी जुटाना ही अब उसकी जिंदगी बन चुकी है। लेकिन एक दिन जैसे उसके जीवन के घनघोर अंधेरे कमरे में खिड़की की दरारों से एक रोशनी पहुंची और मोहन को पूछती है कि क्या तुम पढ़ना चाहते हो?

मोहन ने तुरंत हां में जवाब दिया। लेकिन तभी उसने कहा, मेरे पास किताबें और यूनीफॉर्म खरीदने के पैसे नहीं हैं। यह सुनते ही सवाल पूछने वाले ने मुस्कुराते हुए मोहन का नाम दर्ज कर लिया। कुछ ही दिनों के बाद जहाज में प्रयोग किये जाने वाले कंटेनर मोहन जैसे कई बच्चों का स्कूल बन गया।

वहाँ टेबल-कुर्सियां रखी गईं, ब्लैकबोर्ड लगाया गया और फिर भविष्य निर्माण का कार्य शुरू किया गया। ठाणे नगर पालिका द्वारा स्थापित तथा बटु सावंत के नेतृत्व में संगठित स्वयं सेवी संस्था, ‘समर्थ भारत व्यासपीठ’ द्वारा संचालित, सिग्नल शाला, भारत का पहला ऐसा स्कूल है, जो ट्रैफिक सिग्नल पर काम कर रहे बच्चों के लिए खोला गया है।

यहाँ बच्चों को आते ही सबसे पहले नहला-धुलाकर, यूनीफॉर्म पहनाकर उन्हें खाना खिलाया जाता है और फिर उम्र के अनुसार उन्हें पढ़ाया जाता है। मोहन यहाँ आठवीं कक्षा में पढ़ता है। मोहन को अब अपना चेहरा नया लगने लगा है। उसमें आत्म सम्मान का निर्माण होने लगा है। अब जब भी वह पढ़ाई से छूट कर सड़कों पर गजरे बेचने निकलता है तो रूकी हुई कार के शीशे में अपना अक्श ढूंढता है जो कहीं खो गया था।

अबकी बार जिंदगी ने उसे एक और सबक सिखाया और इस बार वह कड़वा नहीं, थोड़ा खट्टा, थोड़ा नमकीन और थोड़ा मीठा है, शायद किसी फल जैसा।

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