किसी भी देश की संस्कृति उस देश की पहचान होती है जिसे उन्हें सहेजकर रखना होता है। अगर पहचान गई तो अस्तित्व भी चला जायेगा। दूसरी ओर, आज वैश्विकरण के इस दौर में जहाँ हर किसी का किसी और संस्कृति की ओर आकर्षित होना लाजिमी है वहीं किसी देश का अपनी संस्कृति को बरकरार रखना मुश्किल है, खासकर एशिया के देशों को। आज भारतीय युवा जहाँ एक ओर पश्चिमी सभ्यता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, वहीं कुछ विदेशी ऐसे भी हैं जो भारतीय संस्कृति और कला को सीखते हैं, उसकी प्रस्तुति करते हैं और उसके फैलाव में अहम भूमिका भी निभा रहे हैं।

तो चलिए, मिलते हैं उन चार विदेशी संगीतकारों से जो भारतीय संगीत के विस्तार में कार्यरत हैं।

बेटर इंडिया में छपे एक लेख के अनुसार,

1. सास्किया राव-डी हास

नीदरलैंड में जन्मी सास्किया भारत आकर यहीं की हो गईं हैं। वर्षों पहले जब वे विश्व विख्यात संगीत सिरमौर हरिप्रसाद चौरसिया जी से संगीत की शिक्षा ग्रहण करने आईं तो उन्हें इस बात का तनिक भी आभास नहीं था कि उनकी जिंदगी अपने नए मो़ड़ को लेकर तैयार है। उन्होंने सेलो संगीत को एक नया रूप दिया। सेलो सीखते वक्त उसके बड़े आकार के कारण सास्किया कुर्सी पर बैठतीं और गुरू जमीन पर जो उनको तनिक भी नहीं सुहाता। फिर उन्होंने विशेष रूप से ऑर्डर देकर छोटे आकार वाला सेलो बनवाया। उन्होंने भारतीय संगीतज्ञ सितार वादक शुभेद्र राव से शादी की और अब वे दोनों मिलकर भारतीय संगीत के प्रचार-प्रसार में कार्यरत हैं।

2. स्टीव गोर्न

स्टीव गोर्न विश्व भर में अपने अलग और लोकप्रिय संगीत वादन के लिए जाने जाते हैं। वे बांसुरी और सेक्सोफोन वादक हैं तथा ग्रैमी पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। भारतीय संगीतज्ञ और समीक्षक मानते हैं की स्टीव की भारतीय संगीत पर गहरी पकड़ है। स्टीव गोर्न ने संगीत की शिक्षा कोलकाता के स्वर्गीय श्री गौर गोस्वामी से प्राप्त की और इसके बाद भारतीय संगीत को सहेजते, संवारते रहे।

3. केन जुकेरमन

शुरूआत में केन जब भारत आए तो भारतीय संगीत को जानने के उत्सुक थे। उस वक्त तक उनका सीखने का कोई इरादा नहीं था। धीरे-धीरे वे भारतीय वाद्य यंत्र सरोद की ओर आकर्षित हुए और फिर महान गुरू अली अकबर खान के नेतृत्व में 37 वर्षों तक उन्होंने संगीत की तपस्या की और आज वे एक विश्व प्रख्यात सरोद वादक हैं।

4. चोंग शिउ सेन

मलेशिया में पैदा हुए चोंग मूल रूप से चीन के हैं और भारतीय कर्नाटकी संगीत के गायक हैं।कर्नाटकी संगीत से उनका परिचय भजनों के माध्यम से हुआ। चेन्नई में आकर उन्होंने स्वर्गीय कल्लपन स्वामीनाथन से वीणा सीखी फिर उन्हें महसूस हुआ कि उनकी रूचि गायकी की ओर है। महान गुरू डी. के पट्टामल से उन्होंने कर्नाटकी संगीत की शिक्षा ली और आज वे विश्व विख्यात कर्नाटकी संगीत गायक हैं।

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