चाहे आप किसी भी देश में रहते हों लेकिन आप इस बात से जरूर सहमत होंगे किभारत देश की शादियां किसी भी असाधारण उत्सव से कम नहीं होतीं। और अपनी इस शादी को यादगार बनाने के लिए दूल्हा-दुल्हन अक्सर कुछ नया करने की सोचते हैं। ठीक इसी तरह पिछले साल अभिषेक त्रिपाठी और सतरूपा मिश्रा ने ओड़िया रीतिरिवाज से शादी करने का फैसला किया और वे चाहते थे कि यह दिन किसी कार्य को बढ़ावा देने के लिए याद किया जाए। 

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आईआरएस अधिकारी अभिषेक त्रिपाठी और ओडिशा की सतरूपा मिश्रा ने पिछले साल अपनी शादी में कुछ अलग करने की चाह में भारत के हथकरघा और हथकता वस्त्रों को प्रचारित करने का फैसला किया। उन्हें लगा कि देश के हथकरघा और हथकता कपड़ा परम्पराओं को प्रचारित करने का यह बेहतर तरीका है। इसलिए उन्होंने थीम के रूप में हैंडलूम को चुना। 

दिलचस्प बात यह है कि यह भारतीय कला और संस्कृति के प्रति उनका पारस्परिक प्रेम था जिसने नागपुर में नेशनल अकादमी ऑफ़ डायरेक्ट टैक्स(NADT) में अपने प्रशिक्षण के दौरान दोनों को आकर्षित किया था। इसके बाद इन दोनों #OurOdiyaWedding नाम से एक फेसबुक पेज बनाया जिसमें सामान्य ओड़िया शादियों को पोस्ट किया। 

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इसका मुख्य उद्देश्य शादी में आने वाले आमंत्रित लोगों को ओड़िया शादी की परम्पराओं और अनुष्ठान के बारे में अवगत कराना था। और उनके दोस्तों और मेहमानों ने इसे काफी पसंद भी किया। साथ ही उन्होंने एक ऑनलाइन शादी निमंत्रण भी भेजा जिसमें दूल्हे ने सभी मेहमानों से अनुरोध किया था कि सभी बारात(ओड़िया में बाराजत्रि जुलुस) में हैंडलूम वस्त्र पहनें। 

दोनों ने शादी से पहले अपना प्री-वेडिंग फोटो शूट भी करवाया जिसमें इन्होंने पारम्परिक वस्त्र ही पहनें। इस दौरान सतरूपा ने इकत साड़ी पहनी थी। जिसमें गहनों के साथ वे अपनी ओडिसी संस्कृति का प्रदर्शन कर रहीं थीं। और इन्होंने फोटो शूट भुवनेश्वर के प्रसिद्द मंदिरो में करवाया । ताकि वह थीम से विचलित न हों। साथ ही शादी में दुल्हन के जोड़े के लिए भी उन्होंने सम्बलपुरी साड़ी का चुनाव किया। 

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शादी के दिन सतरूपा ने बौला पट्टा(शादी की परम्पराओं के अनुसार दुल्हन द्वारा पहनी जाने वाली पीले रंग की साड़ी पर लाल रेखाएं) का चयन किया। वहीं उनके मित्र ने सतरूपा को पीले रंग की पैठनी उपहार में दी जो कि महाराष्ट्र की पारम्परिक बुनाई है। अभिषेक ने अपनी शादी के लिए ओडिशा इकत तैयार करवाया जो ओडिसा में शादी के लिए शुभ माना जाता है। 

वहीं दूल्हा-दुल्हन के पिता इस शादी के लिए परंपरागत ओड़िया जोदो (ओड़िया का परंपरागत कुरता-पायजामा ) में नज़र आये, साथ ही रेशम के दुप्पटा के साथ इस परिधान को पूर्ण किया। उनके घर के बाकी सदस्यों को लोकप्रिय इकत, पासपल्ली, बोमकई, गोपालपुरी और रंगीन मणिबंद खांडुआ पट्टा साड़ी जैसे परिधानों में देखा गया। 

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सतरूपा ने अपनी  शादी के लिए कांजीवरम, कसाऊ, चंदेरी और बनारसी जैसी साड़ियों की खरीददारी सीधे बुनकरों से की। वहीं अभिषेक की माँ ने आंध्र प्रदेश के बुनकरों से और सतरूपा की माँ ने वाराणसी के बुनकरों से अपनी पारम्परिक रेशम की साड़ियों को खरीदा। 

अभिषेक और सतरूपा अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए कहते हैं कि उनकी शादी में भारतीय बुनाई के वस्त्रों के विभिन्न रूपों की झलक देखने को मिली। इस जोड़े ने अपनी शादी के माध्यम से भारतीय वस्त्रों और बुनकरों के काम को लोकप्रिय बनाने की कोशिश की और दोनों इस प्रयास को आगे भी जारी रखना चाहते हैं। 

 

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