इस लेख को लिखते समय, मेरे मन में उन लोगों के प्रति सम्मान कई गुना बढ़ गया है जो यातायात की समस्या और रास्तों की बुरी परिस्थितियों के बावजूद अपना काम कर्मठता से करते हैं। ऐसी ही कुछ आश्चर्यजनक घटना घटी और एक रोगी तक सरकारी एम्बुलेंस सही समय पर पहुंच गयी और  महिला और उनके नवजात शिशु को नया जीवन देने में कामयाब रही। 

Credit : Wikipedia

कोयंमबटूर के गाँधीवाल निवासी 37 वर्षीय नाणजप्पन पेशे से कूली हैं। अपनी गर्भवती पत्नी को अस्पताल पहुंचाने के लिए उन्होंने आपातकालीन सेवा क्रमांक 108 पर एम्बुलेंस के लिए फ़ोन किया था। रविवार सुबह 5:15 बजे थे, सन्देश प्राप्त करने पर आपातकालीन चिकित्सा तकनीशियन (ईएमटी) के रोजा और एम्बुलेंस चालक अरुण कुमार तुरंत रोगी के पास जाने के लिए निकले। लेकिन जैसे ही वे गांव के पुलिया के पास पहुंचे तो उन्होंने पुलिया को  पूरी तरह से बारिश के पानी से डूबा हुआ पाया। अपने कर्तव्य के रास्ते में उन्होंने इस तरह की बाधा की कल्पना नहीं की थी। 

रोजा और अरुण ने रोगी तक पहुंचने के लिए दूसरे मार्ग के बारे में विचार किया। लेकिन वह रास्ता काफी लम्बा था और गर्भवती स्त्री की स्थिति को देखते हुए उन्हें उस मार्ग से जाना उचित नहीं लगा। तब उन्होंने वहां तक पहुंचने के लिए एक और तरीका निकाला। एक छोटी गोल नाव की मदद से उन्होंने उस पूल को पार किया और एक अनजान व्यक्ति से मोटरसाइकिल मांगकर गर्भवती औरत के पास पहुंचे। भले ही वह तेजी से पहुंचे लेकिन तब तक कविता अपने बच्चे को जन्म दे चुकी थी। नवजात शिशु काफी कमज़ोर था और उस बच्चे को तुरंत उपचार की जरूरत थी। तब दोनों उसी मार्ग से एम्बुलेंस तक दुबारा चले। 

इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार एम्बुलेंस चालक ने कहा, “हमने नाभि को काट दिया लेकिन महसूस किया कि बच्चे को गर्मी और ऑक्सीजन की आवश्यकता है, साथ ही बच्चे को बेहतर चिकित्सा की भी जरूरत थी। इसलिए हम उन्हें मेट्टुपलयम जीएच ले गए। इस बीच हमने एक और वाहन बुलाया ताकि कविता को जल्द से जल्द अस्पताल ले जाया जा सके।” 

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लेकिन जैसे ही वह जाने के लिए निकले उन्होंने देखा चारों ओर पानी भरा था और वाहन आगे जाने में असमर्थ था। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और दूसरा रास्ता ढूंढ़ने  लगे। आखिरकार उन्हें जल्द ही दूसरा रास्ता मिल गया और वे कविता और उस नवजात बच्चे को लेकर अस्पताल पहुंचे। 

प्रकाशन से बात करते हुए रोजा ने कहा, “उस बच्चे को बचाने में हमें गर्व महसूस हो रहा है। अगर हम थोड़ी-सी भी देर कर देते तो शायद बच्चे को नहीं बचाया जा सकता था क्योंकि बच्चें के हाथ और पैर नीले पड़ रहे थे।”

इस तरह के उदाहरण हमें दर्शाते हैं कि ग्रामीण इलाकों में लोगों तक पहुंचने के लिए एम्बुलेंस और आपातकालीन चिकित्सा तकनीशियन को कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। 

इसी महीने की शुरुआत में एक 27 वर्षीय पुरुष चिकित्सा तकनीशियन ने चलती एम्बुलेंस में एक महिला की सफल प्रसूति की थी। बावजूद इसके की महिला के परिवारवाले किसी पुरुष चिकित्सा तकनीशियन से प्रसूति कराने को तैयार नहीं थे। इस तरह की घटनाओं को न सिर्फ लिखा जाना चाहिए बल्कि ऐसे कर्मठ लोगों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए ताकि बाकी लोग प्रेरित हो सकें। 

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