नवंबर 2006 की बात है, बैंबू हाउस के सह-संस्थापक(co-founder) प्रशांत लिंगम अपनी पत्नी अरुणा के साथ इको-फ्रेंडली फर्नीचर खोज रहे थे, जिसके लिए उन्होंने अहमदबाद के एक प्रोफेसर से सम्पर्क किया और वे बांग्लादेश की सीमा कटलामारा पहुंच गए। वहां के कारीगरों के कौशल से प्रशांत इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनके कार्य को देशभर में पहुंचने की ठानी। और इस प्रकार शुरू हुआ उनका व्यापार।

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उन्होंने बिना किसी अनुभव के बांस के घर बनाने की यात्रा की शुरुआत की। शुरुआती तीन सालों में उन्होंने 60 लाख का घाटा उठाया। इस बुरे दौर में वे न ही ठीक तरह से सो सके और न ही ठीक तरह से खाना खा सके। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी अंतिम कोशिश में प्रशांत ने अपनी पत्नी के गहने तक बेच दिए और सारी सम्पत्ति गिरवी रख दी। 

इसके बाद उन्हें पहली सफलता प्राप्त हुई। हैदराबाद के एक स्कूल प्रिंसिपल ने प्रशांत को अपनी बिल्डिंग के ऊपर बांस का पेंटहाउस बनाने के लिए संपर्क किया। प्रशांत के कारीगरों के बेहतरीन काम की वजह से इस पेंटहाउस ने कई लोगों का ध्यान का आकर्षित किया। और उस दिन के बाद प्रशांत की कंपनी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

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कुशल कारीगरों की तलाश के लिए दम्पति ने जनवरी 2007 के बाद डेढ़ वर्ष तक कई राज्यों की यात्रा की, आख़िरकार मई 2008 में तेलंगाना के आदिलाबाद से उन्होंने बांस की टोकरियां बनाने वाले कारीगर चुने और उन्हें हैदराबाद लेकर आये। हर कारीगर को ₹7500 महीना और रहने खाने की सुविधा दी गयी। 

लेकिन नए आईडिया को बेचना बेहद कठिन होता है। इसलिए उन्होंने अपने ही घर की छत के ऊपर दो मंजिला घर बनाना शुरू किया। इस 1800 स्क्वायर फ़ीट के घर में कोई कॉलम बीम नहीं था और उनके इस बाम्बू हाउस में आरामदायक जीवन की कई अन्य सुविधाएं मौजूद थीं। इस दौरान उनके बाम्बू हाउस ने मीडिआ का ध्यान खींचा। 

जिसके बाद उन्हें धीरे-धीरे गूगल, विप्रो, इन्फोसिस और टाटा जैसी कई बड़ी कंपनियों से काम मिलने लगे। लेकिन 2014 तक इनके कारीगरों को ऐसा लगने लगा कि दम्पति का व्यापार उन्हीं पर निर्भर है और ऐसि गलत सोच के कारण इन कारीगरों ने काम में दिलचस्पी लेनी काम कर दी और व्यापर को पुनः घाटा होना शुरू हो गया। 

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इस बार प्रशांत कोई नुकसान उठाना नहीं चाहते थे और 2016 से अपने कारीगरों की निर्भरता को कम करटे हुए उन्होंने घरों की बाहरी फ्रेम को मेटल और बांस के दूसरे उत्पाद के साथ जोड़कर नया तरीका ईजाद किया। साथ ही अपने दिल्ली और गुजरात यात्रा के दौरान प्लास्टिक को फिर से इस्तेमाल करने के तरीके सीखे और बांस के साथ प्लास्टिक के उपयोग पर भी ध्यान दिया। 

इस साल 2018 में प्रशांत और अरुणा ने प्लास्टिक के कचरे से अपना पहला घर बनाया और यह घर दुनिया भर में वायरल हो गया। इस साल जून महीने में दूध की प्लास्टिक की खाली थैलियों से पैवर ब्लॉक्स बनाने शुरू किये। और इसका रोड पर प्रयोग करने के लिए उन्होंने हैदराबाद के नगर निगम के कमिश्नर से बात की जो राज़ी हो गए। 

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करीब 24 लाख दूध की थैलियों से उन्होंने 3100 वर्गफीट का पाथवे बनाया। उनके इस प्रयोग ने दुनिया के देशों जैसे फ्रांस, ब्रिटेन और नीदरलैंड्स का ध्यान खींचा। और अब वे भी अपने घर प्लास्टिक वेस्ट से बनाने की सोच रहे हैं। योजना है कि प्रशांत की कंपनी 2020 तक प्लास्टिक के कचरे से करीब 50 घरों का निर्माण करेगी। 

और कई दूसरे देश चाहते हैं कि प्रशांत उनके देश में आकर अपनी फैक्ट्री लगाएं। प्रशांत की इस नई सोच से उनके सामने शुरू में कई बाधाएं आयीं  लेकिन उन्होंने हार न मानते हुए अपनी पूरी मेहनत लगा दी और आज वे कामयाबी के शिखर पर हैं। 

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