भारत में लड़कों की तरह लड़कियों को भी शिक्षा का समान अवसर मिले और उनकी शिक्षा में किसी भी तरह की रूकावट न आये इस उद्देश्य से 2007 में सफीना हुसैन ने “एजुकेट गर्ल” नामक गैर लाभकारी संस्था को स्थापित किया जिसमें भारत के ग्रामीण समुदाय की लड़कियों को वे शिक्षा प्रदान करती हैं। ऐसी ही एक लड़की हैं सोवनी जिसके परिवार वाले लड़की की पढ़ाई के खिलफ थे फिर भी इस संस्था ने उन्हें शिक्षा का महत्त्व समझाया और सोवनी को शिक्षा के लिए प्रेरित किया। 

 
 
 
 
 
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सोवनी मात्र 9 साल की हैं और आज तक उसने स्कूल का दरवाजा तक नहीं देखा  है। वह अपनी माँ, दादी, तीन भाई, दो बहनें और उनके बच्चों के साथ रहती है। सोवनी के पिता शादियों में मंडप बांधने का काम करते हैं और अक्सर घर से बाहर रहते हैं और महीने में एक या दो बार ही घर आते हैं। 

सोवनी की माँ ज्यादातर बीमार रहती हैं। दादी बूढ़ी हैं। उसकी भाभी अपने बच्चों के साथ व्यस्त रहती हैं इसलिए अपने सबसे छोटे भाई और भतीजे- भतीजी को संभालने की जिम्मेदारी भी सोवनी के कंधे पर आ गयी। 

“एजुकेट गर्ल”(Educate Girl) की स्वंयसेविका आशा याद करते हुए कहती हैं, “जब हम पहली बार सोवनी के घर गए और उसके परिवार वालों को निकटतम स्कूल में सोवनी का दाखिला कराने को कहा तो उसकी दादी और माँ ने जोरदार विरोध किया। सोवनी के घरवालों का कहना था कि, “वह अभी बड़ी हो रही हैं और उसे स्कूल जाने की जरूरत नहीं अगर वह स्कूल  जाएंगी तो मवेशियों को चऱायेगा कौन और घर के कामकाज का ख्याल कौन रखेगा।” 

Credit : The Better India

सोवनी गांव की एकमात्र लड़की नहीं थी जिसके परिवार में लड़कियों के शिक्षा के प्रति प्रतिरोधी मानसिकता थी। लम्बे समय तक इन ग्रामीणों ने महसूस किया कि लड़कियों को पढ़ाने से उनके परिवार को कोई दीर्घकालिक लाभ नहीं होगा। ग्रामीणों के अनुसार लड़कियां अंत में शादी ही करेंगी, बच्चे पैदा करेंगी और अपने घर-संसार में व्यस्त हो जाएँगी तो फिर उन्हें शिक्षित करने से क्या मतलब। 

अधिकांश माता-पिता का तर्क यह भी था कि लड़कियां अगर अकेली स्कूल जाएंगी तो उन्हें खतरा हो सकता हैं लेकिन विडम्बना यह भी हैं कि जब यही परिवारवाले अपने बच्चों को अकेले जंगल में अपने मवेशी चराने भेजते हैं तब इन्हें अपने बच्चों की चिंता महसूस नहीं होती। जबकि कुछ लोग तो यह भी सोचते थे कि यदि लड़कियों को शिक्षित किया जाए तो वे भाग जाएंगी।

 
 
 
 
 
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No girl should be left behind! Our community volunteers and staff members knock on every door in the village to find out-of-school girls and then convince their parents to send them to school. #EducateGirls #educationforall #India

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इन सारी विरोधी मानसिकता के बीच “एजुकेट गर्ल” की टीम ने हार नहीं मानी और उन्होंने सोवनी से बात की तब उन्हें महसूस हुआ कि उसके मन में भी स्कूल जाने की चाह हैं वह अक्सर दूसरी लड़कियों को स्कूल जाते हुए देखती थी। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकती थी क्योंकि उसकी माँ और दादी इसकी मंजूरी कभी नहीं देतीं। 

इसके बाद “एजुकेट गर्ल” की टीम ने सोवनी के परिवालों को समझने की बहुत कोशिश की लेकिन फिर भी बात नहीं बनी। आखिरकार काफी समझने के बाद सोवनी के बड़े भाई सुनने को राजी हो गए और फिर धीरे-धीरे “एजुकेट गर्ल” की टीम कभी बुजुर्गो के साथ तो कभी गांव के शिक्षकों  के साथ सोवनी  के घर नियमित रूप से जाने लगी। 

एक साल के लम्बे प्रयासों के बाद सोवनी को तीसरी कक्षा में नामंकित किया गया। “एजुकेट गर्ल” की टीम के अनुसार सोवनी को कक्षा में नियमित बनाये रखने के लिए उस पर निगरानी रखनी जरूरी थी। शुरुआत में उसे समायोजित करना मुश्किल हो गया था क्योंकि वह कभी स्कूल नहीं गयी थी और न ही उसे मूल पढ़ाई का भी ज्ञान था। 

Credit : The Better India

फिर टीम ने इंटरैक्टिव शिक्षण विधियों के साथ सोवनी को पढ़ाना शुरू किया जिसमें उसे बेसिक पढ़ाई के बारे में शिक्षा दी गयी। उसके बाद उसने पढ़ाई में गति पकड़ी और अब पैसों को गिनने और अन्य कार्यों में वह  अपनी माँ की मदद करती है। अपने छोटे भाई को स्कूल ले जाती हैं और अपना खुद का होमवर्क और अध्ययन करने के अलावा वह अपने भाई को भी उसकी पढ़ाई में मदद करती है। वह आज 10 साल की है और चौथी कक्षा में पढ़ रही है।

सोवनी की शिक्षा ने उनके परिवार की मानसिकता को बदलकर रख दिया है। अब उनकी माँ और दादी शिक्षा के महत्त्व को समझ गयी हैं कि लड़कियां  अब घर से बाहर निकलकर अपना लक्ष्य निर्धारित कर सकती हैं। उन्हें पता चल गया है कि लड़कियों के आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका शिक्षा ही है। 

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