एक ऐसा समय भी था जब देश के हर पेशे पर लगभग सिर्फ पुरुषों का प्रभुत्व था। लेकिन परिवर्तन की हवाएं तेजी से बहने लगीं और महिलाएं, पुरुषों के प्रभुत्व वाले क्षेत्र में जाकर कार्य करने लगीं। लेकिन आज भी कुछ क्षेत्र हैं जहाँ महिलाएं कार्य नहीं कर सकतीं किन्तु चन्द्रिका वर्मा उन महिलाओं में से हैं जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में जाकर खुद की काबिलियत को साबित किया और भारत की पहली महिला खनन इंजीनियर बनीं। 

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चन्द्राणी के पिता माइनिंग इंजीनियर थे। और वह भी अपने पिता की तरह माइनिंग इंजीनियर बनना चाहती थीं। लेकिन उन्होंने इस क्षेत्र में शिक्षा लेनी चाही तो किसी भी कॉलेज ने दाखिला नहीं दिया। क्योंकि साल 1952 के माइन एक्ट के अनुसार महिलाओं को अंडरग्राउंड माइंस में काम करने की अनुमति नहीं थी और वे केवल ओपनकास्ट माइंस में ही काम कर सकती थीं। 

जिसके बाद चन्द्राणी के पिता ने एक वकील के माध्यम से कोर्ट में याचिका दाखिल की जिसके बाद चन्द्राणी को स्पेशल केस में माइनिंग इंजीनियरिंग में प्रवेश लेने की अनुमति मिली। दाखिले के समय कॉलेज के प्रोफ़ेसर ने चन्द्राणी को दूसरा क्षेत्र चुनने की सलाह दी लेकिन वह अपने फैसले पर अड़ी रहीं। यहाँ तक कि उन्हें बताया गया कि उन्हें इस क्षेत्र में नौकरी नहीं मिलगी। 

साल 1999 में चन्द्राणी ने नागपुर के रामदेवबाबा इंजीनियरिंग कॉलेज से अपनी बी. ई (माइनिंग इंजीनियरिंग) की डिग्री पूर्ण की। लेकिन हैरत की बात यह थी कि लड़की होने के कारण उन्हें इस क्षेत्र में नौकरी नहीं मिली। फिर भी चन्द्राणी ने हार नहीं मानी और प्रोफ़ेसर के तौर पर अपना कार्य शुरू किया। लेकिन माइनिंग इंजीनियरिंग बनने का उनका सपना अभी नहीं पूर्ण नहीं हुआ था। 

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इसके बाद उन्होंने मास्टर्स डिग्री हासिल की और शादी कर ली। साथ ही इस दौरान साल 2016 में धनबाद के इंडियन स्कूल ऑफ़ माइंस ने घोषणा की, कि अब वे माइनिंग इंजीनियरिंग में लड़कियों को भी दाखिला देंगे। इसके बाद उन्होंने नागपुर के वीएनआईटी से अपनी पीएचडी की डिग्री पूरी की।

पीएचडी के दौरान उन्होंने दो महीने में खुद कोयले की 600 सैंपल की जिओ-टेक्निकल टेस्टिंग की। जबकि यह टेस्टिंग लैब तकनीशियन करते हैं।  इसके बाद चन्द्रिका को सीएसआईआर केंद्रीय खनन और ईंधन अनुसंधान संस्थान में नौकरी के साक्षात्कार के लिए बुलाया गया जहाँ उन्होंने आधी रात तक इंतज़ार किया। इस साक्षात्कार में बैठने वाली चन्द्रिका अकेली महिला थी। 

चन्द्राणी के चुनाव को लेकर इंटरव्यू पैनल आश्वस्त नहीं था क्योंकि वह एक महिला थीं और उन्हें खुद खदानों में जाकर कार्य  करना था। लेकिन पैनल के सदस्य डॉ. अच्युत कृष्ण घोष ने चन्द्राणी के इस फैसले का समर्थन किया। उन्होंने चन्द्राणी के आत्मविश्वास को भाप लिया था और उन्हें पूरा यकीन था कि वह इस पद के लिए एक अच्छी वैज्ञानिक साबित होंगी। जिसके बाद उन्हें चुन लिया गया और वह देश की पहली महिला माइनिंग वैज्ञानिक बनीं। 

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चन्द्रिका देश की हर लड़की के लिए प्रेरणा हैं जिन्होंने अपना सपना पूर्ण करने के लिए कठिन बाधाओं का सामना किया और अपने संघर्ष, जूनून और समर्पण से भारत की पहली माइनिंग इंजीनियर बनीं। और आज डॉ. चंद्राणी सीएसआईआर- केंद्रीय खनन और ईंधन अनुसंधान संस्थान [सीएसआईआर-सीआईएमएफआर] में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं।

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