डॉ वेलुमणि के पास दो विकल्प थे एक, वह करो जो आसान है और दूसरा, वह करो जो सही है। और उन्होंने वही किया जो सही था। इनका जन्म  सन् 1959 में कोइम्बटूर के एक छोटे से गाँव में हुआ। जब ए. वेलुमणि और उनके तीन भाई-बहनों का लालन-पालन भूमिहीन किसान पिता के लिए मुश्किल हो गया तो माँ ने भैंस पाली और दूध बेचकर गुजारा करना शुरू किया। 

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बेटर इंडिया को दिए एक साक्षत्कार में डॉ वेलुमणि ने कहा, “मेरी माँ ने सिखाया कि बिना कर्ज लिए, कमखर्ची और गरिमा के साथ कैसे जिया जाता हैं।” $500 मिलियन के हेल्थकेयर साम्राज्य के मालिक डॉ वेलुमणि की रंक से राजा बनने की एक दिलचस्प कहानी को आइये जानते हैं। 

वेलुमणि के माता-पिता उन्हें नई जोड़ी जूते या कपड़े तक नहीं खरीदकर दे सकते थे। सरकारी स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई करते हुए वेलुमणि ने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। वे एक आत्मनिर्भर व्यक्ति थे और मद्रास विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन पूरा करने के दौरान उन्होंने कई तरह की मुश्किलों का सामना किया। उन्हें लगा शिक्षा गरीबी से निकलने का एकमात्र रास्ता है। लेकिन बाद में उन्हें अहसास हुआ कि उन्हें कोई नौकरी नहीं देना चाहता था। 

उन्होंने कोयम्बतूर में नौकरी के लिए चार साल तक कठिन संघर्ष किया। बेरोजगारी के उस दौर में लम्बी जद्दोजहद के बाद उन्हें कैप्सूल बनाने वाली एक कम्पनी में ₹150 रुपए प्रति माह वेतन की नौकरी मिली। जहां उन्होंने रसायनज्ञ के रूप में काम किया। लेकिन शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था। कंपनी बंद हो गई। और वे फिर से बेरोजगार हो गए। 

वेलुमणि कहते हैं, “मैं भाग्यशाली था कि एक गांव के गरीब परिवार में पैदा हुआ, मैं भाग्यशाली था कि मैंने चार वर्षों तक नौकरी के लिए संघर्ष किया, मैं भाग्यशाली था कि मेरे पास एकमात्र नौकरी थी वह भी चली गयी, अगर अतीत में यह सब नहीं हुआ होता तो मैं आज इस मुक़ाम तक कभी नहीं पहुंच पाता। आपको अनुभव करना होगा, आपके पास जो नहीं हैं उसे स्वीकारना होगा।”

उसके बाद कुछ करने के दृढ़ निश्चय के साथ उन्होंने कोयम्बतूर छोड़ दिया और बॉम्बे चले आये। लेकिन यहाँ न तो उनका कोई दोस्त था और ना ही कोई ठिकाना और उन्हें यह भी नहीं पता था कि उन्हें जाना कहां है। मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनल्स (विटी स्टेशन) पर उन्होंने तीन रातें बिताईं। वे युवा रसायन विज्ञान स्नातक थे तो उन्होंने नौकरी के लिए भाभा एटॉमिक, मुम्बई प्रयोगशाला में तकनीशियन पद के लिए आवेदन दिया। खुशकिस्मती उनका प्रयोगशाला तकनीशियन के पद के आवेदन को स्वीकार कर लिया गया और उन्हें ₹880 रुपए वेतन की नौकरी मिल गई। 

इसके बाद उन्होंने 1992 में थाइराइड जैव रसायन में पीएचडी पूर्ण की। वेलुमणि के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ उस वक्त आया जब उन्होंने भाभा एटॉमिक में 14 वर्ष काम करने के बाद अपनी नौकरी छोड़ने का फैसला किया, उनके फैसले में उनकी पत्नी ने उनका साथ दिया जो कि एक बैंक कर्मचारी थीं। 

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वे उस समय 37 साल के थे और उनके पास ₹2 लाख जमापूंजी थी। उन्होंने शहर में थायराइड विकारों का पता लगाने के लिए थायराइड परीक्षण प्रयोगशाला शुरू करने का निर्णय लिया। सन् 1996 में नौकरी छोड़कर उन्होंने थायरोकेयर टेक्नोलॉजी की स्थापना की और 500 वर्गफीट की टेस्टिंग लैब खोली। पत्नी ने भी बैंक की नौकरी को अलविदा कह दिया और पूरा परिवार लैब में ही रहने लगा। 

अन्य प्रयोगशालाओं से आधी कीमत पर इन्होंने थायराइड परीक्षण की शुरुआत की। जब उन्होंने किफायती दरों पर थायराइड परीक्षण शुरू किया तो सब उन्हें पागल कहते थे। क्योंकि शुरुआती दो सालों में उन्हें सिर्फ नुकसान हुआ लेकिन तीसरे वर्ष से उन्हें मुनाफा होना शुरू हुआ। पिछले दो दशकों से वे हर साल 25 प्रतिशत मुनाफा कमा रहे हैं। किसी ने सोचा नहीं होगा कि इतनी कम लागत पर थायराइड परीक्षण मुनाफे का सौदा हो सकता है। 

22 साल पूर्व स्थापित थायरोकेयर आज दुनिया की सबसे बड़ी थायराइड परीक्षण कंपनी है। जहां पहले एक दिन में 25 नमूने की जांच की जाती थी, वहीं आज यहाँ हर रोज 70000 से अधिक नमूनों की जांच की जाती है। केवल थायराइड परीक्षण से पिछले दो दशकों के निरंतर प्रयास से वेलुमणि ने स्वस्थ निदान व्यवसाय का विस्तार किया है।  

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यह थायरोकेयर हर रात करीब 350000 चिकित्सा परीक्षण कराता है। इसका नेटवर्क भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश और मध्य पूर्व में फैला हुआ है। इन देशों के 1 हजार से ज्यादा आउटलेट्स और कलेक्शन सेंटर्स से हर रोज ब्लड सेम्पल्स एयर कार्गो से लैब पहुंचते हैं। टेस्ट परिणाम अगले दिन ई-मेल से दे दिए जाते हैं।

इस कंपनी की विशेष बात यह हैं कि इसमें काम करने वाले 98 प्रतिशत कर्मचारी बिना किसी पूर्व अनुभव के हैं। क्योंकि वेलुमणि को याद है कि कैसे उनके पास अनुभव न होने कारण उन्हें अपने संघर्ष के दिनों में चार साल तक नौकरी नहीं मिली थी। एक आदमी को तो तब अनुभव मिल सकता है जब उसे नौकरी पर रखा जाए। यही वजह है कि वे अनुभवी से ज्यादा फ्रेशर्स को नौकरी देते हैं। 

वे लोगों से कहते हैं कि व्यवसाय करने की कोई उम्र नहीं होती। अगर आपके पिता के पास पैसे हैं तो इसे जल्दी शुरू मत करो क्योंकि व्यवसाय 100 मीटर दौड़ नहीं है बल्कि यह एक मैराथन है। अगर सफलता जल्दी मिलती है तो इसे बनाये रखना बहुत मुश्किल होता है।

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