24 वर्षीय मंटेना रवि वर्मा आंध्र प्रदेश के काकीनाडा शहर में पैदा हुए। पिताजी एक फल विक्रेता थे और माँ आंगनवाड़ी में शिक्षिका थीं। रवि बोलने या सुनने की क्षमता के बिना ही पैदा हुए थे। प्रारम्भिक वर्षों में रवि के दोस्त उन्हें काफी तंग करते थे और उनका उपहास भी उड़ाते थे। लेकिन उनकी माँ हमेशा उनके समर्थन में रहती थीं। 

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विकलांग होने के कारण रवि के पिता को उनकी क्षमता पर विश्वास नहीं था। रवि की छोटी बहन भी विकलांग पैदा हुई थी और वह सुन नहीं सकती थी। कुछ समय बाद रवि के पिताजी एक दुर्घटना का शिकार हो गए और उन्हें काम छोड़कर घर बैठना पड़ा।  

अब घर की सारी जिम्मेदारी रवि की माँ पर आ गयी और वह अतिरिक्त घंटे काम करके घर चलाने लगीं। और साथ ही रवि और उनकी बहन को भी शिक्षित किया। रवि सरकारी स्कूल में पढ़ते थे और उनके सहपाठी उन्हें काफी चिढ़ाते थे। और उनका उपहास उड़ाते थे। जिसकी शिकायत वह अपने शिक्षक से भी करते लेकिन वे रवि की बातें समझ नहीं पाते थे। 

उसके बाद रवि को एक विशेष स्कूल में भेज दिया गया। उन्हें पता था कि गरीबी से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता शिक्षा ही है। वह वाणिज्य में स्नातक करना चाहते थे। लेकिन घर की आर्थिक तंगी की वजह से उन्हें बाहर निकलकर काम करना पड़ा। उन्हें पता था कि घर की दशा बदलने के लिए  नौकरी करनी जरूरी है। 

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इसीलिए रवि विशाखापत्तनम में युथ फॉर जॉब्स (Y4J ) नामक गैर सरकारी संगठन से जुड़े। और यहीं से उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। रवि को अगर कोई पूछता कि उनका सपना क्या है तो वह कहते, “मैं अमेज़न में मैनेजर बनाना चाहता हूँ।” Y4J के माध्यम से रवि  को अमेज़न पूर्ति केंद्र में एक पैक सहयोगी के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। 

आज रवि अपने घर में अकेले सदस्य हैं जो कमाते हैं और साथ ही आंध्र विश्वविद्यालय से बी कॉम कंप्यूटर साइंस की अपनी पढ़ाई भी पूर्ण कर रहे हैं। रवि अभी दूसरे वर्ष में पढ़ रहे हैं। उन्होंने स्कूल के बाद अच्छी नौकरी खोजने के लिए काफी संघर्ष किया। लेकिन आज रवि अपने घर की पूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। जिसका श्रेय वे अमेज़न को देते हैं। 

अमेज़न विकलांगो के जीवन को बदलने के लिए Y4J और Vशेष जैसे गैर सरकारी संगठनों से साझेदारी करता है। ताकि विकलांगों को नौकरियों के अवसर प्राप्त हो सकें जिसके लिए कंपनी के पूर्ति केंद्र मील का पत्थर साबित हो रहे हैं। इन पूर्ति केंद्रों में इन विकलांगों को एक रंगीन शर्ट दी जाती है जिससे उन्हें पहचानने में आसानी हो। 

साथ ही मूकबधिर व्यक्ति की भाषा को समझने के लिए दुभाषिये को भी काम पर रखा जाता है। जो इन विकलांगो का दोस्त बनकर उनकी मदद कर सके और उनकी जिम्मेदारी संभाल सके।  

अब रवि अपने इस कार्य से बहुत खुश हैं।अपने काम पर उन्हें गर्व है और उनके सहयोगी भी उनके साथ अलग व्यवहार नहीं करते हैं और न ही कोई उनका उपहास करता है। इस कार्य से उनके घर की आर्थिक परिस्थिति में भी काफी सुधार हुआ है। 

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