“मैं मानता हूँ कि बड़ी सफलता पाने के लिए असाधारण प्रतिभा का होना जरूरी नहीं। औसत बुद्धि वाले लोग भी जीवन में मनचाहा मुकाम हासिल कर सकते हैं।” यह कहना है मुकेश सिंह राजपूत का जिन्होंने कचरा बीनने, ऑटो रिक्शा चलाने और हर तरह के संघर्ष के बाद अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट  बनने के सपने को पूरा किया। 

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मुकेश सिंह राजपूत का परिवार मध्य प्रदेश के पिपरिया गांव में रहता था। वे औसत दर्जे के छात्र थे। लेकिन उनके सपने बहुत बड़े थे। उनके पिता टेलर थे और आर्थिक तंगी के कारण उनके माता-पिता के बीच अक्सर झगड़ा होता रहता था। जिस वजह से बगैर किसी गलती के मुकेश की पिटाई भी हो जाती थी। एक बार पिता ने इतनी बुरी तरह से पीटा की उन्होंने तुरंत अपना स्कूल बैग उठाया और रेलवे स्टेशन की ओर चले गए। प्लेटफार्म पर जो ट्रैन दिखी उसमें बैठकर भोपाल पहुंच गए। 

वहाँ पहुंचने के बाद उन्हें काफी जोर से भूख लगी लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे। फिर उन्होंने देखा किसी ने बचा हुआ खाना एक कोने में फेंक दिया है। उन्होंने तुरंत वह खाना उठा लिया और उसे खा लिया। उस समय वे आठ साल के थे। उन्हें पता था कि बगैर पैसे के कुछ नहीं मिलता। अगले दिन उन्होंने देखा कि कुछ लड़के कबाड़ चुनकर स्टेशन के बाहर वाली कबाड़ की दुकान पर बेच रहे हैं । उन्होंने भी थैले का जुगाड़ लगाया और कबाड़ चुनकर वहीं बेच दिया। जिससे उन्हें 50 पैसे मिले और उस पैसे से उन्होंने जैसे-तैसे अपना पेट भरा। 

इसके बाद उन्होंने रेल के डिब्बों में झाड़ू लगाना शुरू किया। वहाँ एक झाड़ू गैंग थी जिसके सरदार ने उन्हें आमदनी का आधा हिस्सा देने को कहा। उन्होंने विरोध किया तो उन्हें बुरी तरह से पीटा गया। वे रोते हुए वहाँ से भाग गए और दूसरी ट्रैन से इगतपुरी पहुंच गए। वहाँ एक सज्जन ने उन्हें देखा और खाना खिलाया और अपने साथ कल्याण ले गए।वे वहां कबाड़ की दुकान में और उसके बाद एक होटल में बर्तन धोने का काम करने लगे। उसके बाद दुकान के मालिक उन्हें उत्तर प्रदेश ले आये। जहाँ एक छात्रा के साथ उनकी दोस्ती हो गयी जिसने मुकेश से अपने सपने पूरे करने के लिए पढ़ाई का सहारा लेने को कहा । उससे प्रोत्साहन पाकर दाखिले के लिए वे नजदीकी स्कूल चले गए जहाँ उन्हें दस्तावेज मांगे गए जो उनके पास नहीं थे। 

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इसके बाद वे अपने गांव पिपरिया लौट आये। सात-आठ साल बाद जब वे घर पहुंचे तो उनके माता-पिता उन्हें देखकर बहुत खुश हुए। और उन्होंने वहीं पर चाय नाश्ते की दूकान डाल ली। लेकिन चाय की दुकान से मुकेश अपने सपनों को पूरा नहीं कर सकते थे। इसलिए वे सारे दस्तावेज लेकर फिर से भोपाल आ गए और वहां एक केमिकल फैक्ट्री में काम करने लगे । इस बीच उन्होंने लोडिंग रिक्शा भी चलाया। एक बार मालिक ने उन्हें कुछ कागजात लेकर  सीए मनोज खरे के ऑफिस भेजा। जहाँ सीए की ठाट बाट देखकर उनके मन में भी चार्टेड अकाउंट बनने की ललक जाग उठी। 

इसके बाद उन्होंने सीधे पांचवी के बाद 10वीं की परीक्षा का फार्म भरा। इस समय उनकी उम्र 18 साल थी। लोडिंग रिक्शा चलाने के साथ उन्होंने पढ़ाई भी जारी रखी। वे लगातार तीन बार फ़ेल हुए और चौथे प्रयास में 10वीं की परीक्षा पास की। उसके बाद प्राइवेट परीक्षा देने के लिए 12वीं का फार्म भरा और कॉलेज पास किया। इसके बाद सीए की पढ़ाई का संघर्ष शुरू हुआ। इस दौरान उन्होंने एक बिल्डर के यहाँ ड्राइवर की नौकरी कर ली। जहाँ उन्हें पढ़ाई के लिए काफी समय मिलने लगा। 

जब उन्होंने सीए की परीक्षा पहली बार दी तब यहाँ भी वे फ़ेल ही हुए और लगातार छह बार फ़ेल होते गए। किन्तु नाकामी को अपना हथिआर बनाकर, इस दौरान परीक्षा में जहाँ उनसे गलती हुई होती, वे उसे सुधारते चले गए और इस तरह सातवीं बार वे पास हुए।  इस दौरान उन्हें अकाउंट सम्बन्धी छोटे मोटे काम मिलते गए। और उन्होंने अपने परिवार को पिपरिया से भोपाल बुला लिया इसके बाद तीसरे ग्रुप की परीक्षा में भी उन्हें असफलता हाथ लगी। लेकिन सारी परेशानियों से जूझते हुए आखिरकार मुकेश चार्टर्ड अकाउंट बन ही गए। 

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इसके बाद वे उसी सीए मनोज खरे के ऑफिस गए जहाँ से उनके मन में सीए बनने की ललक जागी थी। मनोज खरे मुकेश को देखकर यकीन नहीं कर पाए कि एक ऑटो रिक्शा चलाने वाला लड़का जो उन्हें कुछ पेपर देने आया था सीए बन सकता है। आज मुकेश का अपना ऑफिस है। और इसी के साथ वे एकाउंट्स पढ़ने वाले युवाओं की मदद भी करते हैं। और सैकड़ों युवाओं को मुफ्त प्रैक्टिकल एकाउंटेंसी की ट्रेंनिंग भी देते हैं। ताकि उन्हें रोजगार मिल सके। 

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