जहां एक ओर भारत के रास्ते अपने खस्ताहाल के कारण पूरे विश्व में चर्चित हैं। वहीं असम के डिब्रूगढ़ की एक सड़क ऐसी है जिसपर चलने के बाद आपको अहसास होगा कि आप विदेशों की सड़कों पर घूम रहे हैं। इस सड़क का नाम है हेरम्बा बारदोलोई पथ। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस सड़क का निर्माण सरकार ने नहीं बल्कि गौतम बारदोलोई नामक व्यक्ति ने इसे अपने पैसों से किया। 

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दरअसल हेरम्बा बारदोलोई एक सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार थे। और उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों की सेवा करने में लगा दिया। साथ 1968 की बाढ़ में बेघर हुए मछुआरों का पुनर्वास किया। उनके कार्यो को देखते हुए नगर निगम ने 2008 में असम, डिब्रूगढ़ के बोइरगिमोथ इलाके के एक रास्ते को उनका नाम दे दिया। लेकिन दुर्भाग्यवश उसी साल उनका देहांत हो गया। 

लेकिन जिस सड़क का नाम हेरम्बा के नाम पर रखा गया था। उसकी हालत बहुत खस्ता थी। दरअसल यह सड़क एक कच्चा रास्ता हुआ करती थी। और बरसात के दिनों में इस रास्ते पर जाना बहुत मुश्किल था। यह रास्ता किसी बड़े गड्ढ़े से कम नहीं था। यह रास्ता बोइरगिमोथ इलाके का सबसे पुराना था और इस कॉलोनी में हजारों लोग रहते थे।

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हेरम्बा बारदोलोई के बेटे गौतम बारदोलोई के लिए यह बहुत गर्व की बात थी कि यह सड़क उनके पिता के नाम पर है। लेकिन सड़क की दयनीय स्थिति को देखते हुए उन्होंने इस सड़क की हालत सुधारने का बीड़ा उठाया और 2013 में इस सड़क को विश्वस्तरीय बनाने का निर्माणकार्य शुरू कर दिया। 

हालांकि यह इतना आसान नहीं था। क्योंकि गौतम हांगकांग में नौकरी करते थे। और सड़क का निर्माणकार्य देखने के लिए वह अक्सर डिब्रूगढ़ आते-जाते रहते थे। सड़क के निर्माण के लिए गौतम ने सबसे पहले रास्ते को डेढ़ फ़ीट ऊँचा करने के लिए उसे भरना शुरू किया। और लोगों के घरों के सामने पीवीसी पॉवर ब्लॉक का भी उपयोग किया। 

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लेकिन इस सड़क को आधुनिक रूप देने का कार्य 2017 में शुरू हुआ। सबसे पहले इस रास्ते पर बारिश का पानी जमा न हो इस लिए ड्रोनेज सिस्टम पर काम किया गया। और सड़क के दोनों ओर बगीचा लगाने का कार्य शुरू हुआ। कुछ स्थानीय लड़कों ने इस सड़क को पेंट करने में भी मदद की और साथ ही इस सड़क पर सोलर स्ट्रीट लाइट भी लगाए गए। 

आज जब कोई भी उस सड़क से गुजरता है, वह इस बदलाव को देखकर यकीन नहीं कर पाता। जबकि गौतम इस सड़क के निर्माण में लागत की चर्चा कदापि नहीं करते हैं लेकिन यह अनुमान लगते हैं कि इसको बनाने में उन्हें करीब 13 लाख खर्च आया है। वह कहते हैं कि, “मेरे पिता ने अपना पूरा जीवन सामाजिक सेवा में बिताया है, इतना तो कम से कम मैं कर ही सकता हूँ ।”

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