भारत में कुछ ऐसे समुदाय हैं, जो प्रकृति को सम्मान देते हैं। जिनमें से बिश्नोई समुदाय एक है। जिन्होंने कई दशकों तक पर्यावरणविद के रूप में प्रकृति को संजोकर रखा है। बिश्नोई ने अपने पर्यावरण प्रेम से यह साबित कर दिया है कि वे प्रकृति को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यहाँ तक कि वेे अपने जीवन का भी त्याग कर सकते हैं। 

अमृता देवी बिश्नोई इसका सबसे बेहतर उदाहरण हैं। जिन्होंने प्रकृति की रक्षा के लिए सन 1730 में 300 से अधिक लोगों के साथ अपना बलिदान दिया जिनमें अमृता देवी की तीन बेटियां भी शामिल थीं। इस तरह के बलिदान के बाद 1970 के दशक में चिपको आंदोलन की नींव रखी गयी थी।

इस तरह के मजबूत उदाहरण में हम एक नाम और जोड़ सकते हैं। जोधपुर के पास एकलखोरी गांव में रहनेवाले 78 वर्षीय राणाराम बिश्नोई का, जो बंजर रेगिस्तान को हराभरा करने के लिए कई दशकों से प्रयासरत हैं। जिन्होंने अकेले ही दस एकड़ भूमि में 27000 से भी अधिक पेड़ लगाए हैं।

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राणाराम इन पेड़ो को पानी देने के लिए हर दिन 3 किलोमीटर की यात्रा करते हैं। वे अपने मित्र के टूबवेल से एक बड़ी मटकी में पानी इकट्ठा करते हैं और पेड़ों को पानी देते हैं। आज नीम, अंजीरी, रोहिदा, खेजरी, कंकरी, बबूल और बोगनविल्ला जैसे स्वदेशी वृक्षों की किस्में बरकरार हैं। जिसे कई साल पहले राणाराम ने ही लगायीं हैं। 

राणाराम कहते हैं, “यह पौधे मेरे लिए भगवान् की तरह हैं, और उनकी सेवा करके मैं राहत महसूस करता हूँ। मैं अपने घर की महिलाओं को इस कार्य के लिए साथ ले जाता हूँ। या फिर गांव की लड़कियां भी मुझे इस कार्य में मदद करती हैं जिसके लिए मैं प्रति पेड़ 2 रूपए उन्हें भुगतान करता हूँ।”

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राणाराम को इसकी प्रेरणा पचास साल पहले बीकानेर में हुए एक समुदाय त्यौहार से मिली। जहाँ वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि बिश्नोई का जीवन पर्यावरण और उसके सरंक्षण पर केंद्रित होना चाहिए। उस दिन के बाद राणाराम का जीवन पूरी तरह से बदल गया। और लौटने के बाद उन्होंने कुछ पेड़ अपने गांव के आस-पास लगाए। 

पर्यावरण के लिए राणाराम का यह अमर प्रेम और पर्यावरण के सरंक्षण के लिए उनका धर्मयुद्ध हम सबके लिए एक उदाहरण है। हम में से प्रत्येक को अपने घर में पेड़ जरूर लगाने चाहिए। अगर एक आदमी ऐसे समर्पण के साथ रेगिस्तान की बंजर जमींन को बदल सकता है तो विचार करें कि हम सभी एक साथ क्या नहीं कर सकते। 

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