ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान ऐसे कई स्वतंत्रता सेनानी थे जो बहुत ही बहादुरी से लड़े और जिन्होंने देश के लिए अपना बलिदान दिया. ऐसे बहुत से बेनाम नायक हैं जिन्हें आज भी कोई पहचान नहीं मिली है. वो हमारे देश के ऐसे नायक हैं जो आज भी नाम और सम्मान के इंतज़ार में हैं. ऐसे ही कुछ दिग्गजों में से एक हैं यह स्वतंत्रता सेनानी, जो सालों से बच्चों को मुफ़्त शिक्षा प्रदान कर रहे हैं. उन्होंने कभी भी सामने आकर अपनी इस सफलता की चर्चा नहीं की. वह हमारे देश के सच्चे हीरो हैं.

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सुधांशु बिस्वास का जन्म 1917 में अविभाजित बंगाल में हुआ था और वह एक सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे. उसके बाद वह एक नए मिशन पर निकल पड़े और भारत को आज़ादी मिलने के बाद भी वह कभी चैन से नहीं बैठे. उन्होंने गरीब बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देने का निर्णय किया. उन्होंने 1973 में रामकृष्ण सेवाश्रम की शुरुआत की और पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में 18 प्राइमरी स्कूल भी खोले.

इतना ही नहीं, बिस्वास एक वृद्धाश्रम, डिस्पेंसरी और बाल आश्रम भी चलाते हैं.

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आज़ादी के बाद बिस्वास पर स्वामी विवेकानंद के सिद्धान्तों का बहुत गहरा असर हुआ. वह डेढ दशक के लिए अपने सामाजिक जीवन से पूरी तरह गायब हो गए और ज्ञान की तलाश में हिमालय पर चले गए.

समय बीतने के साथ-साथ, उनके द्वारा चलाया गया मिशन भी फैलता जा रहा है. रामकृष्णपुर के इस अनौपचारिक स्कूल ने मूलभूत सुविधाओं से वंचित बच्चों और अनाथों के जीवन को बदल दिया है. इस स्कूल की एक अच्छी बात यह है कि इसमें पढ़ने वाले कुछ बच्चे आज आराम से अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं और उन में कुछ अध्यापक, डॉक्टर और इंजिनियर बनकर देश की सेवा कर रहे हैं. क्योंकि बिस्वास स्वयं विवेकानंद के दिखाए मार्ग पर चलते थे, उनकी दी हुई शिक्षा इस स्कूल की शिक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था.बिस्वास स्वयं भी गणित के अध्यापक थे.

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बिस्वास ने इस मिशन को यहीं पर रुकने नहीं दिया, उन्होंने पास के गावों के कुछ वृद्ध लोगों को आश्रय भी दिया. क्योंकि अब वह भी वृद्ध हो चले थे,इसलिए उन्होंने एक चैरिटेबल डिस्पेंसरी चलाने के बारे में सोचा और आम दवाईयां और होमियोपैथी की दवाईयोंको  इकठ्ठा करके मरीजों को मुफ़्त में वितरित करने लगे.

यह जानकर बहुत अच्छा लगता है कि आज भी हमारे समाज में बिस्वास जैसे लोग हैं. जब भारत में हर तरफ अराजकता का माहौल था तो बिस्वास भारतीयों को अंग्रेजों से आज़ाद कराने के मिशन पर चल पड़े थे और आज आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी इनका लक्ष्य है देश के पिछड़े हुए लोगों को शिक्षित बनाना.

हम देश के लिए निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले इस महान व्यक्ति को सलाम करते हैं.

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