बचपन से ही उम्मुल खेर (Ummul Kher) नाजुक हड्डी संबंधी विकार से पीड़ित हैं। जब वह 14 साल की थी तो उसके माता-पिता ने उन्हें छोड़ दिया था क्योंकि वह आठवीं कक्षा के बाद भी स्कूल जाना जारी रखना चाहती थी। उनके दृढ़ संकल्प और ज्ञान के लिए खोज के कारण उन्हें एक के बाद एक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University) में प्रवेश अर्जित किया और फिर जेएनयू (JNU) में दाखिला ले लिया था। इस साल, उन्होंने यूपीएससी परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली।

एक फेसबुक पोस्ट में अपनी सफलता का जश्न मनाते हुए, उम्मुल कहती हैं कि कभी-कभी यात्रा भी गंतव्य के समान ख़ूबसूरत होती है। उन्होंने एक और पोस्ट में कहा, “आख़िरकार मेरा बचपन का सपना सच हो गया है। मेरे पहले ही प्रयास में मैं एक लोक सेवक बन गई हूँ।”

Credit: Facebook | Ummul Kher

हिंदुस्तान टाइम्स (Hindustan Times) के अनुसार, उम्मुल को आज तक नाजुक हड्डी संबंधी विकार के कारण 16 फ्रैक्चर और आठ सर्जरी का सामना करना पड़ा है। जब वह पांचवीं कक्षा में थी तो उनका परिवार राजस्थान से दिल्ली चला गया था। उनके पिता ने हज़रत निजामुद्दीन के पास सड़क विक्रेता के रूप में कपड़े बेचकर कड़ी मेहनत की और उनका परिवार पास ही एक झुग्गी में रहता था।

एचटी की एक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि उन्होंने प. दीनदयाल उपाध्याय इंस्टीट्यूट फॉर द फिजिकली हैडीकैप्ड (Pt Deendayal Upadhyaya Institute for The Physically Handicapped) में अपनी पाँचवी कक्षा की पढ़ाई की थी और बाद में अमर ज्योति चैरिटेबल ट्रस्ट (Amar Jyoti Charitable Trust) से आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। जीवन उनके लिए कभी भी आसान नहीं था।

उन्होंने एचटी (HT) को एक साक्षात्कार में कहा, “यह सरकार द्वारा संचालित धर्मार्थ संगठन था और मुझे कुछ भी भुगतान नहीं करना था। हालांकि दो समय का भोजन जुटाना मुश्किल था, मैं संतुष्ट थी कि कम से कम मैं पढ़ाई कर सकती हूं।”

उन्होंने बताया, “मैं अरवचिन भारती भवन वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय (Arwachin Bharti Bhawan senior secondary school) में पढना चाहती थी क्योंकि उसका बुनियादी ढांचा बेहतर था और मुझे छात्रवृत्ति मिली थी।”

हालांकि उनके माता-पिता उनके फैसले से सहमत नहीं थे और उन्होंने उनके साथ सभी संबंधों को तोड़ने की धमकी दी थी। उन्होंने एचटी (HT) को बताया, “मुझे गालियाँ दी जाती थी। मेरे इरादों पर सवाल उठाया गया था क्योंकि मैं पढाई करना चाहती थी। यह सबसे खराब समय था। उन्होंने कहा कि अब तुमने किसी अन्य लड़की की तुलना में अधिक शिक्षा प्राप्त कर ली है।”

Credit: Facebook | Ummul Kher

इस बिंदु पर, उदास होने और अपने सपनों को छोड़ने के बजाय, उम्मुल ने एक झुग्गी को किराए पर लिया, बच्चों को टयूशन पढ़ाना शुरू कर दिया और अपने घर के किराए के लिए पैसे कमाए। उनके लिए अकेला रहना आसान नहीं था और उम्मुल को 3 बजे से रात 11 बजे तक चार बैचों में बच्चों को पढ़ाना पड़ता था। प्रत्येक बच्चे से उन्हें केवल 50-100 रुपये मिलते थे।

उन्होंने कहा, “मैं और अधिक पैसों की उम्मीद नहीं कर सकती थी क्योंकि ये मजदूर, लोहार, रिक्शा चलाने वालों के बच्चे थे। इसके अलावा, एक लड़की के रूप में एक झुग्गी में अकेला रहना कभी-कभी बहुत दर्दनाक होता था। यह कभी भी सुरक्षित नहीं था लेकिन मेरे पास कोई अन्य विकल्प नहीं था।”

12 वीं कक्षा में उन्होंने 91 प्रतिशत अंक हासिल करने के बाद गार्गी कॉलेज (Gargi College) में दाखिला ले लिया था। दिल्ली विश्वविद्यालय के दिनों से उनके मित्र अभिषेक रंजन (Abhishek Ranjan) ने एचटी को बताया, “उन्होंने डीयू कॉलेजों में बहस में जीत पर हासिल किये गए धन के माध्यम से अपनी शिक्षा का खर्च-भार उठाया। आप अच्छे पैसे कमा सकते हैं क्योंकि कुछ कॉलेजों में होने वाले समारोहों में इनाम राशि बहुत अधिक होती है, लेकिन यहां भी, वह शाम में आयोजित बहसों में शामिल नहीं हो सकती थी क्योंकि उन्हें ट्यूशन लेनी होती थी।”

कॉलेज के बाद, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों की पढ़ाई करने के लिए जेएनयू में दाखिला ले लिया और उन्होंने टयूशन पढ़ाना बंद कर दिया क्योंकि उन्होंने 2000 रुपए के साधन-सह-योग्यता छात्रवृत्ति प्राप्त कर ली थी। फिर जूनियर रिसर्च फैलोशिप (Junior Research Fellowship) (जेआरएफ) परीक्षा पास करने के बाद उनका जीवन बेहतर हो गया था और उन्हें हर महीने 25,000 रुपये मिलना शुरू हो गया था।

उम्मुल को अपने परिवार के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है और उन्हें अभी तक उनकी सफलता के बारे भी नहीं पता है क्योंकि उन्हें नहीं पता कि यूपीएससी परीक्षा को उत्तीर्ण करने का क्या मतलब है। उनके माता-पिता राजस्थान में अपने घर लौट आए हैं और उनके भाई चूड़ियाँ बेचकर अपनी आजीविका अर्जित करते हैं।

उन्होंने कहा, “मैं उन्हें दोष नहीं देती हूँ। वे एक ऐसे वातावरण में पले-बढ़े थे जिसने उनकी सोच को ऐसा बना दिया था। यह उनकी गलती नहीं है।”

उम्मुल पूरे भारत में कुल 420 स्थान पर रही थी। उन्हें आशा है कि उन्हें दिव्यांगता कोटा के माध्यम से आईएएस में दाखिला मिल जाएगा। हम उन्हें शुभकामनाएं देते हैं!

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