जिनके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, उनके पास पाने के लिए सारा जहाँ होता है। इस बात को सच साबित किया है भावेश भाटिया ने। भले ही वह आंखों से देख नहीं सकते लेकिन ऐसे लोगों के लिए रोज़गार उपलब्ध करा रहे हैं जो भावेश की ही तरह दुनिया नहीं देख सकते हैं। यह उनकी मेहनत का ही फल है कि कभी फेरी लगाकर अपना घर चलाने वाले भावेश आज 25 करोड़ के टर्नओवर वाली सनराइज कंपनी (Sunrise Company) के मालिक हैं।

Image result for भावेश भाटिया
Credit: YourStory

भावेश बचपन से ही अंधे नहीं थे। उनकी आंखों की रोशनी धीरे-धीरे जाती रही। वे रेटिना मस्कुलर डिटेरियेशन (Retina Muscular Deterioration) नामक बीमारी से ग्रस्त थे। इसमें मरीज़ की आंखों की रोशनी समय के साथ घटती जाती है। इस बीमारी के कारण उनके सहपाठी भी उनका मजाक उड़ाते थे। उन्होंने जब इसकी शिकायत अपनी मां से की तो उन्होंने उन्हें समझाया कि वे तुम्हारे दोस्त बनने के लिए ऐसा करते हैं। बस मां की इस सीख से उन्होंने उन सभी को अपना दोस्त बना लिया जो उनको कभी उनकी कमजोरी की वजह से चिढ़ाते थे।

इसके बाद भावेश बहुत टूट गए थे लेकिन मां की एक सीख उन्होंने गांठ बांध ली थी कि अगर वह दुनिया नहीं देख सकते तो कुछ ऐसा करें कि दुनिया उनको देखे। इसके बाद भावेश कुछ ऐसा करने की तलाश में जुट गए जिससे न केवल उनकी जिंदगी बेहतर बन सके बल्कि वह अपने जैसे तमाम अन्य लोगों की जिंदगी को भी बेहतर बना सकें। भावेश को बचपन से ही हाथों से छोटी-छोटी चीजें बनाना अच्छा लगता था। पहले वे पतंग बनाते थे और इसके बाद मोमबत्तियां बनाने लगे। इसी बीच उन्हें प्रशिक्षण की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने “नेशनल एसोसिएशन ऑफ ब्लाइंड इंस्टीट्यूट” (National Association Of Blind Institute) से मोमबत्तियां बनाने का प्रशिक्षण लिया। फिर वह हाथ से बनाई मोमबत्तियाें को महाबलेश्वर के स्थानीय बाजार में ठेले पर बेचने लगे।

Image result for भावेश भाटिया
Credit: sunrisecandles.in

अपनी जीवन संगिनी नीता से भावेश की मुलाकात मोमबत्तियाें के जरिए हुई थी। वह उनसे मोमबत्तियां खरीदने आई थीं और उनके व्यवहार से प्रभावित होकर उनको अपना दिल दे बैठी थीं। काफी मिलने-जुलने के बाद उन्होंने शादी करने का फैसला किया। हालांकि नीता के परिवार ने इसका बहुत विरोध किया था लेकिन उन्होंने अपना फैसला नहीं बदला। नीता का साथ मिलने के बाद उनकी जिंदगी थोड़ी आसान जरूर हुई लेकिन घर की आर्थिक स्थिति तब भी अच्छी नहीं थी। कहीं से भी बिज़नेस के लिए ऋण नहीं मिल रहा था। उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा समय वह था जब उन्हें सतारा बैंक से 15 हजार का ऋण मिला। इससे उन्होंने मोम, ठेला और ज़रूरत की कई सारी चीजें खरीदीं। उनकी मेहनत रंग लाई और उनका बिजनेस चल निकला।

Image result for भावेश भाटिया
Credit: MoneyShri

उन्होंने बाद में “सनराइज कैंडल्स” (Sunrise Candles) कंपनी बनाई जो आज 9000 डिजाइन वाली सादी और सुगंधित मोमबत्तियां बनाती है। आज उनके ग्राहकों की सूची में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ (Reliance Industries), बिग बाजार (Big Bazaar), रैनबैक्सी (Ranbaxy), नरोद इंडस्ट्रीज़ (Narod Industries) और रोटरी क्लब (Rotary Club) जैसी प्रमुख कंपनियां हैं। फिलहाल इस कंपनी का टर्नओवर 25 करोड़ से ज्यादा है।

Image result for भावेश भाटिया
Credit: Youngisthan. In

मोमबत्ती का कारोबार जमाने के बाद भावेश ने जिंदगी का आनंद लेना नहीं छोड़ा और न ही एक ही मंजिल पर उन्होंने अपने कदम रोके। उन्होंने बिजनेस के साथ शॉटपुट (Shotput), डिस्कस (Discus) और जेवलिन थ्रो (Jevlin Throw) जैसे खेलों का भी अभ्यास शुरू कर दिया। आज उनके पास पैरालंपिक (Paralympic) खेलों में जीते गए कुल 109 मेडल हैं। भावेश ने जिस तरह गरीबी और नेत्रहीनता के अभिशाप के बावजूद सफलता पा कर दिखाई है वो एक बार फिर साबित करता  है कि इंसान अपनी मेहनत और जज़्बे से कुछ भी हासिल कर सकता है।

Share

वीडियो

Ad will display in 09 seconds