इस भाग-दौड़ वाली और स्पर्धात्मक दुनिया में लोगों में मानवता अब भी जिंदा है, जिसका उदाहरण हमें आए दिन मिलते रहता है। हाल ही में एक सहकर्मी ने अपनी दोस्त की जान बचाने के लिए किडनी दान करके एक मिसाल पेश की है। 40 वर्षीया दितिप्रिया दास ने झारखंड की रहने वाली 32 वर्षीया मोर्शेनिल सिन्हा की जान अपनी एक किडनी दान देकर बचायी।

 

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इस अंग प्रत्यारोपण को फॉर्टिस हॉस्पिटल एंड किडनी इंस्टीट्यूट (Fortis Hospital & Kidney Institute) के डॉक्टरों ने सफलता के साथ अंजाम दिया। जानकारी के अनुसार, मोर्शेनिल क्रॉनिक किडनी डिजीज (Chronic Kidney Disease) से ग्रस्त थीं। पिछले 4 वर्षों से डॉ. उत्पल सेनगुप्ता के पास उनका इलाज चल रहा था। वे कई वर्षों से किसी डोनर का इंतजार कर रही थीं, लेकिन उन्हें कोई डोनर नहीं मिल रहा था।
चिकित्सा संबंधी समस्या के कारण उनके परिजन भी मदद नहीं कर पा रहे थे। किडनी प्रत्यारोपण न हो पाने के कारण सिन्हा का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था। यह देख डॉक्टर ने उनके परिजनों से कहा कि जल्द से जल्द किडनी प्रत्यारोपण न किया गया तो खतरा बढ़ सकता है। तभी मानवता की मिसाल पेश करते हुए दितिप्रिया दास आगे आयीं।
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डॉ. सेनगुप्ता ने बताया कि किडनी प्रत्यारोपण का ऑपरेशन सफल रहा और डोनर व रेसिपियंट दोनों स्वस्थ हैं। सहकर्मी के लिए अपने अंग को दान कर दास ने लोगों को दुबारा मानवता पर विश्वास करने के लिए मजबूर कर दिया है।
वहीं ऑपरेशन के दौरान आने वाली समस्याओं के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, “इससे पहले डोनर व उनके परिजनों को पूरी तरह ऑपरेशन के बारे में समझाया गया। इसके साथ ही दोनों के राज्यों की सरकार से ऑपरेशन की अनुमति ली गयी। उन्हें और भी अन्य कानूनी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा।”
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दास और  सिन्हा दोनों बेंगलुरू स्थित एक आइटी कंपनी में काम करती हैं। दास, सिन्हा की सीनियर हैं, लेकिन दोनों में अच्छी दोस्ती है। सिन्हा के बिगड़ते स्वास्थ्य की जानकारी मिलते ही दास ने अपनी एक किडनी सिन्हा को दान देने का निर्णय किया और कोलकाता पहुंच गयीं।
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यहां उन्होंने अंग प्रत्यारोपण से पहले होने वाली जांच करवाई और डॉक्टरों के साथ मरीज के परिजनों से भी बात की। डॉक्टरों ने दास को अंग प्रत्यारोपण के बाद आने वाली कठिनाइयों के बारे में जानकारी दी और उससे उभरने की सलाह भी दी। सभी औपचारिकताओं के बाद किडनी प्रत्यारोपण का ऑपरेशन सफलतापूर्वक किया गया।
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