आपने बहुत-सी हिंदी फिल्में देखी होंगी जहाँ हीरो काफी गरीब होता है। खेतों में काम करता है, फिर शहर जाकर अपनी मेहनत और मजदूरी से बहुत बड़ा आदमी बन जाता है। आज हम आपको ऐसी शख्सियत के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है । भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक बिहार में स्थित अररिया जिले के फारबिसगंज कस्बे में मिर्दुअल गाँव के एक किसान के घर में जन्मे अमित कुमार दास के परिवार में भी लड़के आम किसान परिवारों की तरह बड़े होकर खेती में हाथ बंटाया करते थे लेकिन अमित का मन बड़े होकर एक सफल इंजिनियर बनने का था परन्तु परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि अमित की इच्छाएं पूरी हो सकतीं।

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Credit: India Today

अपनी शुरुआती पढ़ाई गाँव के स्कूल से करने के बाद बिहार के सहरसा में एक स्कूल से 10वीं की परीक्षा पास की। उसके बाद इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के बाद अमित ने कुछ इंजीनियरिंग कॉलेज की परीक्षाएं दीं लेकिन सफलता उनसे कोसों दूर थी। इंजीनियरिंग परीक्षा में सफलता ना पाते देख उनके दिमाग में मछली पालन से लेकर फसल का उत्पादन दोगुना करने के लिए ट्रैक्टर खरीदने जैसे ख्याल आने लगे जो कि स्वाभाविक थे क्योंकि अमित कुमार जिस क्षेत्र से संबंध रखते हैं वहाँ इन चीजों की  अपार संभावनाए थी। लेकिन जब उन्होंने इसके बारे में पता किया तो उन्हें लगा कि इसके लिए काफी पैसों की जरूरत होगी, तो उन्हें अपना सपना धुंधलाता हुआ -सा नजर आने लगा।

परिवार पर ज्यादा बोझ ना डालते हुए अमित 250 रुपए लेकर दिल्ली आ गए। यहां आकर उन्हें अहसास हुआ कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई का खर्च वे नहीं उठा पाएंगे। ऐसे में वे पार्ट-टाइम टयूशन लेने लगे। साथ ही उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से बी.ए की पढ़ाई शुरू कर दी। पढ़ाई के दौरान उन्हें कंप्यूटर सीखने की सूझी। इसी मकसद के साथ वे दिल्ली के एक प्राइवेट कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर पहुंचे। सेंटर पर रिसेप्‍शनिस्ट ने उनसे अंग्रेजी में सवाल पूछे लेकिन वे उसका जवाब नहीं दे पाए। रिसेप्शनिस्ट ने उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया। वे उदास मन के साथ घर जाने लगे। एक आदमी ने उनकी उदासी देखकर कारण जानना चाहा। वजह पता चलने पर उन्होंने अमित को इंगलिश स्पीकिंग कोर्स करने का सुझाव दिया। अमित को यह सुझाव अच्छा लगा और उन्होंने बिना देर किए तीन महीने का कोर्स ज्वॉइन कर लिया।

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इस कोर्स से अमित की इंग्‍लिश अच्छी हो गई थी और उनमें एक नया आत्मविश्वास आ गया था। इसी के साथ अमित फिर से उसी कंप्यूटर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में पहुंचे और इस बार उन्हें दाखिला मिल गया। अब अमित को दिशा मिल गई थी। 6 महीने के कंप्यूटर कोर्स में उन्होंने शीर्ष स्थान प्राप्त किया। अमित की इस उपलब्धि को देखते हुए इंस्टीट्यूट ने उन्हें तीन साल के लिए प्रोग्रामर की नौकरी का प्रस्ताव दिया।

प्रोग्राम पूरा होने पर इंस्टीट्यूट ने उन्हें फैकल्टी के तौर पर नियुक्त कर लिया। वहां पहली सैलरी के रूप में उन्हें 500 रुपए मिले। कुछ साल काम करने के बाद अमित को इंस्टीट्यूट से एक प्रोजेक्ट के लिए इंग्लैंड जाने का अवसर मिला लेकिन अमित ने जाने से इनकार कर दिया। वे भारत में ही अपना कारोबार शुरू करना चाहते थे। उस समय अमित की उम्र 21 साल थी। इसके चलते अमित ने नौकरी छोड़ दी। कुछ हजार रुपए की बचत से दिल्ली में एक छोटी-सी जगह किराए पर ली और अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी “आइसॉफ्ट” शुरू की। कुछ महीनों तक उन्हें एक भी प्रोजेक्ट नहीं मिला। गुजारे के लिए वे जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में रात 8 बजे तक पढ़ते और फिर रात भर बैठ कर सॉफ्टवेयर बनाते थे। उनकी मेहनत और लगन आख़िरकार रंग लाई और धीरे-धीरे उन्हें प्रोजेक्ट मिलने लगे।

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अपने पहले प्रोजेक्ट के लिए उन्हें 5000 रुपए मिले। इसी दौरान उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट की प्रोफेशनल परीक्षा पास की और “इआरसिस” नामक सॉफ्टवेयर तैयार किया और उसे पेटेंट भी करवाया। 2006 में उन्हें ऑस्ट्रेलिया में एक सॉफ्टवेयर फेयर में जाने का मौका मिला।इस अवसर ने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया। इससे प्रेरित होकर उन्होंने अपनी कंपनी को सिडनी ले जाने का फैसला कर लिया। आइसॉफ्ट सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी की तरक्की शुरू हो चुकी थी। आज इस कंपनी ने ऐसे मुकाम को छू लिया, जहां वह हजारों कर्मचारियों और दुनिया भर में सैकड़ों क्लाइंट्स के साथ कारोबार कर रही है। इतना ही नहीं 150 करोड़ रुपए के सालाना टर्नओवर की इस कंपनी के ऑफिस सिडनी के अलावा, दुबई, दिल्ली और पटना में भी स्थित हैं।

अमित को अपने राज्य बिहार में शिक्षा के अवसरों की कमी का अहसास भी था। साल 2009 में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने फारबिसगंज में उनके नाम पर एक कॉलेज खोला। कॉलेज का नाम मोती बाबू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी है। उच्च शिक्षा प्राप्त करके कुछ बनने का सपना देखने वाले बिहार के अररिया जिले के युवाओं के लिए इससे अच्छा उपहार कोई और नहीं हो सकता था।

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अमित कुमार दास की कहानी ऐसे लोगों के लिए प्रेरणा है जो अपने सपनों को साकार करने के लिए कभी हार नहीं मानते हैं और निरंतर अपने लक्ष्य को पाने की कोशिश में लगे रहते हैं।

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