सोचिए, कि अगर दो देशों के बीच युद्ध में एक देश का कमांडर दूसरे देश के किसी सैनिक की बहादुरी से इतना प्रभावित हो जाए कि उनके मरणोपरांत उनकी प्रतिमा बनाकर संबंधित देश को भेंट करे तो कैसा होगा? निश्चित ही उस सैनिक के अंदर अदम्य साहस भरा होगा जिससे प्रभावित होकर दूसरे देश ने उनको इस प्रकार सम्मानित किया। एक ऐेसे ही वीर योद्धा से आज हम रूबरू होंगे जो हमारे भारत देश के हैं और जिनका नाम है शहीद जसवंत सिंह।

 

 
 
 
 
 
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बात है वर्ष 1962 में भारत-चीन के बीच हुई लड़ाई की। सिपाही जसवंत सिंह अपने साथियों के साथ नूरारंग के सेला टॉप की एक सड़क मोड़ पर अपनी लाईट मशीन गन के साथ तैनात थे। चीनी सैनिक बार-बार उस चौकी पर हमला कर उसे कब्जा करने की कोशिश में थे लेकिन वे वहां से हटने का नाम नहीं ले रहे थे।

जसवंत सिंह और उनके साथी लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी और गोपाल सिंह गोसांई ने देखा कि एक चीनी बंकर से एक मीडियम मशीन गन लगातार गोलियां बरसा रही है जिससे उन्हें काफी क्षति हो रही है। उन्होंने उसे नेस्तनाबूद करने का फैसला किया। उन्होंने बंकर के पास पहुंचकर उसके अंदर ग्रेनेड फेंका और जैसे ही चीनी सैनिक बंकर से बाहर निकले वे उन पर टूट पड़े। इसके बाद वे चीनी मशीनगन को भारतीय बंकर में ले गए और उस मशीनगन से चीनियों को ही तहस-नहस करने लगे।

 

 
 
 
 
 
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शरीर तो मिट जाता है पर जज्बा हमेसा जिन्दा रहता है…❤ एक बार जरूर पढें, ? वो महज 19 साल का जवान था… 1962 के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए जसवंत सिंह की शहादत से जुड़ी सच्चाई बहुत कम लोगों को पता हैं। उन्होंने अकेले 72 घंटे चीनी सैनिकों का मुकाबला किया और विभिन्न चौकियों से दुश्मनों पर लगातार हमले करते रहे। उन्‍होंने अकेले 300 चीनी सैनिकों को मारा गिराया था। उनसे जुड़ा यह वाकया 17 नवंबर 1962 का है, जब चीनी सेना तवांग से आगे निकलते हुए नूरानांग पहुंच गई थी।जब चीनी सैनिकों ने देखा कि एक अकेले सैनिक ने तीन दिनों तक उनकी नाक में दम कर रखा था तो इस खीझ में चीनियों ने जसवंत सिंह को बंधक बना लिया और जब कुछ न मिला तो टेलीफोन तार के सहारे उन्हें फांसी पर लटका दिया। फिर उनका सिर काटकर अपने साथ ले गए। जसवंत सिंह रावत के मारे जाने के बाद भी उनके नाम के आगे न तो शहीद लगता है और ना ही स्‍वर्गीय। ऐसा इसलिए क्‍योंकि सेना का यह जाबाज जवान आज भी ड्यूटी करता है। ऐसा कहा जाता है कि अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले के जिस इलाके में जसवंत ने जंग लड़ी थी उस जगह वो आज भी ड्यूटी करते हैं और भूत प्रेत में यकीन न रखने वाली सेना और सरकार भी उनकी मौजूदगी को चुनौती देने का दम नहीं रखते। जसवंत सिंह का ये रुतबा सिर्फ भारत में नहीं बल्कि सीमा के उस पार चीन में भी है। हर दिन उनका जूता पॅालिश होता है लेकिन जब रात में जूते को देखा जाता है तो ऐसा लगता है जैसे जूता पहनकर कोई कहीं गया था…. [email protected]_pahad #jaswantsinghrawat#jawan#indianarmy#diedfornation#rip#jaihind#jaibharat#jauttrakand#independayday2018

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एक बार तो चीनी मैदान छोड़ कर भाग गए लेकिन उन्होंने फिर से उनकी चौकी पर हमला किया। जसवंत सिंह के सभी साथी शहीद हो चुके थे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने बंकर नहीं छोड़ा और चीनियों से 72 घंटें तक लड़ते रहे। उस 72 घंटे की लड़ाई के दौरान उन्होंने चीनियों को खासा परेशान किया और उनके कई सैनिक मार गिराए।

लेकिन आखिर वे अकेले कब तक लड़ते। जब उन्हें लगा कि वे चीनियों के हाथ लग जाएँगे, उन्होंने भगतसिंह की तरह दुश्मनों के हाथ लगने के बेहतर खुद को गोली मारना बेहतर समझा और अंतिम गोली खुद को मार ली। जब वे 10 हजार फीट की ऊंचाई पर लड़ रहे थे उस वक्त उनकी मदद वहाँ की दो स्थानीय लड़कियाँ सेला और नीरा ने की।

लेकिन राशन पहुंचाने वाले एक शख्स ने चीनियों को यह संदेश पहुंचाया कि वहाँ सिर्फ एक भारतीय सैनिक है जो लड़ रहा है। यह सुनकर चीनियों ने पूरे जोर-शोर से उन पर हमला किया। चीनी कमांडर जसवंत सिंह से इतने खफा थे कि उन्होंने उनका सर कलम किया और अपने साथ ले गये। लेकिन उनकी बहादुरी से भी वे अत्यंत प्रभावित थे। इसी कारण लड़ाई खत्म होते ही चीन में उनकी एक प्रतिमा बनवाई गयी और भारतीय सैनिकों को भेंट की गयी। जो आज भी उनकी स्मारक में मौजूद है।

 

 
 
 
 
 
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#WeSaluteHimInMemoryOfHim ???? #JaswantSinghRawat #BraveIndianRifelman #GarhwalRifels #1962 India-China war #RealHeroof1962War #NuranangWar #ArunachalPradesh #Tawang?️??⛰️

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जहाँ उन्होंने मोर्चा संभाला वहाँ उनके नाम का एक मंदिर बनाया गया। वहाँ से गुजरने वाला भारतीय सेना का कोई भी जवान चाहे वह अफसर हो या सैनिक, उनको श्रद्धांजली दिए बगैर आगे नहीं जाता। विश्व इतिहास में वे अकेेले ऐसे सैनिक हैं जिन्हें मरणोपरांत भी पदोन्नति दी जाती है। पहले नायक फिर कप्तान और अब वे मेजर जनरल के पद पर पहुंच चुके हैं।

उनके परिवार वाले उनकी छुट्टी के लिए सेना के हेडक़्वार्टर को चिट्ठी लिखते हैं। उसके बाद सेना उनके चित्र को पूरे सम्मान के साथ उनके पुश्तैनी गाँव ले जाते हैं जो कि उत्तराखंड में स्थित है। छु्ट्टी खत्म होने पर उनकी तस्वीर को ससम्मान वापस ले जाकर उसी मंदिर में स्थापित कर दिया जाता है। उस मंदिर में जसवंत सिंह के द्वारा इस्तेमाल की गई ज्यादातर चीजें मौजूद हैं।

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