“मैंने अपनी जिंदगी में ज्यादा कुछ नहीं सीखा, मैंने जेवलिन फेंकना सीखा और बस मैंने यह सोचा कि जेवलिन ही फेंकना है मुझे। मैं ऐसा खिलाड़ी हूँ जिसने अपने जेवलिन को कभी नहीं छोड़ा। यहाँ तक कि उसे अपने कमरे में भी रखता हूँ।” ये शब्द उस खिलाड़ी के हैं जिन्होंने जीवन के घनघोर अंधियारे को अपनी इच्छाशक्ति के प्रकाश से रौशन किया।

पढ़िए उस जांबाज खिलाड़ी की कहानी जिनका नाम है देवेंद्र झजरिया।

 

Devendra Jhajharia became India’s second gold medal winner at the Rio Paralympics after he broke his own world record with a throw of 63.7m in the men’s F46 Javelin Throw.🥇 It was a historic moment for the country as Devendra became the first Indian to win two individual Gold medals at the Paralympics/Olympics – the one-armed thrower had won the gold medal at the Athens Games in 2004.🥇 Jhajharia, who already has a long list of achievements to his name, was born into a low-income family of Churu district in Rajasthan 🇮🇳 At the age of eight, he lost his left hand after accidentally touching an electric wire while trying to climb a tree. 😑 His success as a javelin thrower – made tougher against the backdrop of financial disabilities – is testament to his willpower and physical prowess. 💪 India’s flag-bearer at the 2016 paralympics, Jhajharia was awarded the Arjuna award in 2004 and the Padma Shri in 2012, becoming the first Paralympian to receive the honour🇮🇳 Reposted from our #IndianAthlete #DevendraJhajharia in the the #FieldEvent #throwing #KhelegaIndia tabhi toh #JeetegaIndia —————————————— 📲 Watch numerous stories of Indian athletes 🤸 on our website mentioned in the bio!! Follow us on FB 🔜 @kreedonworld 📠 DM 📨 us if you are an #IndianProAthlete 🥋⚽🏸 and need a shoutout 🎤🔊📣 Also don’t forget to Turn On Post Notifications to get instant updates 📩 —————————————— #strongathlete #athletelife #justdoit #fitlife #beastmode #activeliving #sweatlife #training #fitness #fitfam #trainhard #fitathlete #fitnessgoals #neverbackdown #ripped #passionforsports #fitathlete #getstrong #paralympics #prideofindia

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जोश टॉक्स के एक कार्यक्रम में इस विश्वस्तरीय भारतीय खिलाड़ी ने अपने जीवन के उन अंधियारों के बारे में बताया जिसको पार करने के लिए एक आम इंसान को खुद की इच्छाशक्ति, दृढ़निश्चय और मेहनत से खास बनाना पड़ता है। महज 8 वर्ष की उम्र में एक दुर्घटना के दौरान अपना एक हाथ खो देने के बाद वे एक आम इंसान की तरह खुद को समाज के अन्य लोगों से अलग समझने लगे।

लेकिन किसी ने सच ही कहा है कि ईश्वर हर जगह नहीं हो सकते इसलिए उन्होंने माँ बनायी। देवेंद्र के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उस दर्दनाक घटना के अगले ही दिन उनकी माँ ने उन्हें सामान्य बच्चों के साथ खेलने भेज दिया और फिर यहीं से देवेंद्र के मन में आत्मविश्वास जागा और उन्होंने जाना कि वे एक आम इंसान की तरह ही सबकुछ कर सकते हैं। वर्ष 2002 में इनको भारतीय टीम में जगह मिली।

 

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वर्ष 2004 में उन्होंने पहले भारतीय होने का गौरव हासिल करते हुए एथेंस में आयोजित पैराओलंपिक में भाग लिया और विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण पर कब्जा किया। इसके साथ ही इन्होंने रियो पैराओलंपिक में भी विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पर कब्जा जमाया। देवेंद्र का मानना है कि जीवन में कोई भी काम नामुमकिन नहीं है अगर कुछ मायने रखता है तो वो है आपकी मेहनत और आपकी इच्छाशक्ति।

देवेंद्र ने बताया कि, “एक बार किसी ने मुझसे पूछा कि जीवन में सबसे ज्यादा खुशी आपको कब मिली?” मैंने कहा, “जब मैंने पैराओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता और पदक लेते समय मेरा राष्ट्रीय ध्वज राष्ट्रीय गान के साथ सबसे ऊपर गया, वह वक्त मेरी जिंदगी का सबसे अधिक खुशी का क्षण था।”

 

वास्तव में देवेंद्र जैसे लोग सफलता और मेहनत की तमाम परिभाषाओं को बदल देते हैं और उदहारण स्थापित करते हैं कि अगर किसी इंसान में इच्छाशक्ति है तो वह कुछ भी करने में सक्षम है।

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