कर्नाटक, भारत का दक्षिणी राज्य, जो संस्कृति और विविधताओं से भरा हुआ है, एक ऐसा राज्य जो परंपराओं और रीति-रिवाज़ों से परिपूर्ण है। धूमधाम और भव्यताओं के साथ मनाए जाने वाले यहां के सभी त्योहारों से अलग “कर्नाटका राज्योत्सव” की छटा ही निराली है, कोई भी अन्य त्योहार इसके समतुल्य नही है। इस दिन कर्नाटक के सभी लोग एक-साथ मिलकर कर्नाटक राज्य की स्थापना दिवस मनाते हैं। 

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स्टेट रीऑर्गनाइजेशन एक्ट द्वारा पास किए जाने के बाद 19 नवंबर 1956 में कर्नाटक राज्य की स्थापना हुई, इससे पूर्व कर्नाटक को मैसूर राज्य के नाम से जाना जाता था। यह वह मौका था जब सभी कन्नड़ क्षेत्रों को विलय कर एक कर दिया गया और इस तरह मैसूर राज्य की स्थापना हुई। हालांकि, कुछ क्षेत्र के लोगों ने मैसूर नाम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद लंबे समय तक इस बात को लेकर चर्चा हुई और नवंबर 1973 में मैसूर का नाम बदलकर कर्नाटक कर दिया गया। इसके बाद से हर साल नवंबर के पहले सप्ताह में राज्य का सबसे बड़ा त्योहार “कन्नड़ राज्योत्सव” और “कर्नाटक स्थापना दिवस” के रुप में मनाया जाता है।

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इस दिन पूरा राज्य उत्सव के माहौल में रमा नज़र आता है और कर्नाटक राज्य के अलग-अलग रणनीतिक स्थानों पर कर्नाटक का अनौपचारिक झंडा फहराया जाता है। इस दिन राज्य के विभिन्न इलाको में लोग लाल और पीले रंग के पारंपरिक पोशाक में नज़र आते हैं। अपनी नृत्य-संगीत, नाटक और जुलूस के माध्यम से लोक कलाकार प्रदेश के समृद्ध और गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हैं।

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इसी दिन राज्य सरकार उन लोगों को राज्योत्सव अवार्ड देती है, जिन्होंने राज्य के विकास में अपनी अहम भूमिका निभाई होती है। यह पुरस्कार उन छात्रों को भी दिया जाता है, जिन्होंने  विभिन्न राष्ट्रीय खेलों में पदक हासिल किया हो। यह दिन वास्तव में कर्नाटक राज्य को सलाम करने का दिन है और विकास के क्षेत्र में इसके निरंतर प्रगति का जश्न मनाने का दिन है।

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